हज़ारों रंग में तुम
तुम में हज़ार रंग.
सात रंग में इन्द्रधनुष है, किन्तु
मात्र तुम में स्पंदन.
Boston, 11 August 2011
word meaning
स्पंदन - the essence of motion / heartbeat
हज़ारों रंग में तुम
तुम में हज़ार रंग.
सात रंग में इन्द्रधनुष है, किन्तु
मात्र तुम में स्पंदन.
Boston, 11 August 2011
word meaning
स्पंदन - the essence of motion / heartbeat
बुझा बुझा सा है,
मेरा रंगीन बगीचा.
मानो लाल पीला नीला,
Daisy और hydangea ,
सब बदल गए मुरझाए सफ़ेद में.
तुम आओ,
मुस्काओ,
बगीचे में रंग भर दो.
हे मेरी तुम,
अपने रस से,
मुझे फिर से जीवित कर दो..
- 4 जुलाई 2011 , boston
संगीता जी दिल्ली में रहती हैं और बिखरे मोती नाम का एक ब्लॉग रखती हैं. http://gatika-sangeeta.blogspot.com/ . सार्थक नाम है इनके ब्लॉग का ! इतनी सुन्दर और कोमल रचनायें पढ़ मन गद-गद हो गया. ये सभी कवितायेँ इनके ब्लॉग से ली गयीं हैं और इनके सर्वाधिकार संगीता जी के पास सुरक्षित हैं. मैं इन्हें केवल non -commercial तरीके से प्रस्तृत कर रहा हूँ…
http://gatika-sangeeta.blogspot.com/2011/03/blog-post_18.html पलाश
पलक पर जमी
शबनम की बूंद को
तर्जनी पर ले कर
जैसे ही तुमने चूमा
मेरी आँखों में
न जाने कितने
पलाश खिल गए ….
http://gatika-sangeeta.blogspot.com/2010/09/blog-post.html
खामोशियाँ
ठहर गयीं हैं
आज
आ कर
मेरे लबों पर
खानाबदोशी की
ज़िंदगी शायद
उन्हें
रास नहीं आई
http://gatika-sangeeta.blogspot.com/2010/07/blog-post_21.हटमल
तमन्ना ने तेरी
होठों पे उंगली
रख कर
जैसे ही कहा
“श्श्शश्श”
सारे मेरे ख्वाब
ठिठक कर
रुक गए…
http://gatika-sangeeta.blogspot.com/2010/03/blog-post_24.हटमल
कल्पना के
इन्द्रधनुष को
किसी क्षितिज की
दरकार नहीं
ये तो
उग आते हैं
मन के
आँगन के
किसी कोने में ….
रुक जाता है New York ,
ठहर जातें हैं चलते कदम,
चुप हो जाती है सभी सडकें,
उन चंद लम्हों के लिए,
जब तुम मेरी किसी बात पर,
शर्माती हो…
8 जून २०११, Boston
New York stops.
footsteps stop,
and the streets turn silent,
for those few moments
When while listening to me,
you blush.
This poem has been taken from http://vatsanurag.blogspot.com/2008/09/blog-post_07.html . It is a very nice blog where you can read poems spanning the whole spectrum of emotions.
This poem, by Laltu, talks about ‘correct’ distances - It is difficult for me to write what it is about. Suffice to say that I was touched.
१
फिर मिले
फिर किया वादा
फिर मिलेंगे।
२
बहुत दूर
इतनी दूर से नहीं कह सकते
जो कुछ भी कहना चाहिए
होते करीब तो कहते वह सब
जो नहीं कहना चाहिए
आजीवन ढूंढते रहेंगे
वह दूरी
सही सही जिसमें कही जाएँगी बातें
अच्छी तरह याद है
तब तेरह दिन लगे थे ट्रेन से
साइबेरिया के मैदानों को पार करके
मास्को से बाइजिंग तक पहुँचने में।
अब केवल सात दिन लगते हैं
उसी फ़ासले को तय करने में −
हवाई जहाज से सात घंटे भी नहीं लगते।
पुराने ज़मानों में बरसों लगते थे
उसी दूरी को तय करने में।
दूरियों का भूगोल नहीं
उनका समय बदलता है।
कितना ऐतिहासिक लगता है आज
तुमसे उस दिन मिलना।
===
(My Translation follows)
I distinctly remember,
it took 13 days,
To cross the Trans-Siberian rail,
reaching Beijing from Moscow.
Now it takes only 7 days,
to travel the same distance,
and a flight takes less than 7 hours.
In the ‘old’ times,
It would take years to make that journey
Not the geography of distances,
rather their times change.
Today It feels so historical ,
to have met you that day.
( As usual, this poem has been taken from Kavitakosh )
Trains entice me. And today, while coming back from wall street I was indeed thinking about how to reach home as quickly as possible.. Probably catch a 2 to 96th Street and then a 1 to 125th Street. The question is : what if journey is staid, and rest is transient? Amazing thought by Kunwar Narayan. Highly Recommended!
हम सब एक सीधी ट्रेन पकड़ कर
अपने अपने घर पहुँचना चाहते
हम सब ट्रेनें बदलने की
झंझटों से बचना चाहते
हम सब चाहते एक चरम यात्रा
और एक परम धाम
हम सोच लेते कि यात्राएँ दुखद हैं
और घर उनसे मुक्ति
सचाई यूँ भी हो सकती है
कि यात्रा एक अवसर हो
और घर एक संभावना
ट्रेनें बदलना
विचार बदलने की तरह हो
और हम सब जब जहाँ जिनके बीच हों
वही हो
यह कविता यहा से ली गयी है. ( क़विता कोश)
यह कविता, जो बहुत कम शब्दों में बहुत अधिक कह जाती है, हमे बताती है की कुंवर नारायण को साहित्य अकादमी का सम्मान क्यूँ मिला! बेहद खूबसूरत, कमाल है!
====
उदासी भी
एक पक्का रंग है जीवन का
उदासी के भी तमाम रंग होते हैं
जैसे
फ़क्कड़ जोगिया
पतझरी भूरा
फीका मटमैला
आसमानी नीला
वीरान हरा
बर्फ़ीला सफ़ेद
बुझता लाल
बीमार पीला
कभी-कभी धोखा होता
उल्लास के इंद्रधनुषी रंगों से खेलते वक्त
कि कहीं वे
किन्हीं उदासियों से ही
छीने हुए रंग तो नहीं हैं ?
यह जगह वही है
जहां कभी मैंने जन्म लिया होगा
इस जन्म से पहले
यह मौसम वही है
जिसमें कभी मैंने प्यार किया होगा
इस प्यार से पहले
यह समय वही है
जिसमें मैं बीत चुका हूँ कभी
इस समय से पहले
वहीं कहीं ठहरी रह गयी है एक कविता
जहां हमने वादा किया था कि फिर मिलेंगे
ये शब्द वही हैं
जिनमें कभी मैंने जिया होगा एक अधूरा जीवन
इस जीवन से पहले।
This poem has been taken from the book , “Pank aur patwaar”. This talks about the Dr Jeckyll and Mr Hyde type twin personalities of a person. It is interesting to see how this duality may mean different things. I think Kedar talks about how our socio-economic consciousness restraints us when we try to follow things that make us happy.
खुल गया हूँ मैं ,
धुप में धान के खेत की तरह
हर्ष से हरा-भरा,
भीतर-बाहर लहरा.
मुझे देखता है,
मेरा ही विरोधी व्यक्तित्व,
लालची निगाहों से,
काटकर ले जाने के लिए,
हाट* में बेचकर,
पैसे कमाने के लिए
हाट = weekly village market.
इंतज़ार में,
चुप हैं कलियाँ,
मुस्कुराएं जो तुम आओ,
आँख से आँख मिलाओ,
एकात्म हो जाओ.
I am reading about astronomy these days, what are nakshatras, asterisms etc. Here is a poem by Dushyant Kumar, very much different from his usual style, that talks about eclipse and a women’s beauty. I find these poems, that club human love with Nature’s beauty, to be brilliant.
सध्य्स्रात तुम,
जब आती हो,
मुख कुन्तलों से ढका रहता है,
बहुत बुरे लगते हैं वो क्षण जब,
राहू से काल ग्रसा रहता है* !
( सध्य्स्रात = one who has just bathed ,
.कुन्तल = hair
राहू = an imaginary planet/demon which eats up sun and moon causing solar/lunar eclipses )
पर जब तुम
केश झटक देती हो अनायास
तारों सी बूँदें
बिखर जातीं हैं आसपास
मुक्त हो जाता है चाँद*
तब बहुत भला लगता है!
( अनायास = sudden
* this refers to passing of an eclipse )
यह कविता कविता कोष / http://avinashkishoreshahi.wordpress.com/2010/03/30/ से ली गयी है.
मैं तमाम दिन का थका हुआ, तू तमाम शब का जगा हुआ
ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर, तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ
कई अजनबी तेरी राह के मेरे पास से यूँ गुज़र गये
जिन्हें देख कर ये तड़प हुई तेरा नाम लेके पुकार लूँ
लोग कैसे लिख पाते हैं इतने सुन्दर शब्द? मैं हैरान हूँ! कैसे कवि ने “एक बुढाए कुआँ ” कह उसे एक व्यक्तित्व दे दिया है! आह! नमस्तुते कवि, नमस्तुते!
यह कविता http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%86%E0%A4%81_/_%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF से ली गयी है
प्यास बुझाता रहा था जाने कब से
बरसों बरस से
वह कुआँ
लेकिन प्यास उसने तब जानी थी
जब
यकायक बंद हो गया जल-सतह तक
बाल्टियों का उतरना
बाल्टियाँ- जो अपना लाया आकाश डुबो कर
बदले में उतना जल लेती थीं
प्यास बुझाने को प्यासा
प्रतीक्षा करता रहा था कुआँ, महीनों
तब कभी एक
प्लास्टिक की खाली बोतल
आ कर गिरी थी
पानी पी कर अन्यमनस्क फेंकी गई एक प्लास्टिक-बोतल
अब तक हैण्डपम्प की उसे चिढ़ाती आवाज़ भी नहीं सुन पड़ती
एक गहरा-सा कूड़ादान है वह अब
उसकी प्यास सिसकी की तरह सुनी जा सकती है अब भी
अगर तुम दो पल उस औचक बुढ़ाए कुएँ के पास खड़े होओ चुप।
[ Word meanings
यकायक = suddenly
जल-सतह = water surface
अन्यमनस्क = the feeling of finding something useless / absent mindedly
सिसकी = sniffle
औचक = surprised/ sudden ]
गुलरभोज में बाबा के कमरे में एक चित्र टंगा था. उगते हुए लाल सूर्य का चित्रण था. साथ ही एक कविता की ये पंक्तियाँ भी थी -
” नए गगन में,
नया सूरज जो चमक रहा है,
ये विशाल भूखंड,
आज जो दमक रहा है,
मेरी भी आभा है इसमें ! “
( This poem has been taken from http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A4%A8_%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%B9_/_%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF )
There are poems on love. There are poems on Nature. But there are some poems which coalesce both human love and the beauty of nature to produce something that ‘hits’ you. )
सम्बोधन चिन्ह
दिन की फुर्सत के फैलाव-बीच उगे
एक पेड़ के तने से
पीठ टिका कर
जब तुम एक प्रेम-पत्र लिखना शुरू करते हो
कुछ सोचते और मुस्कुराते हुए
तुम्हें अचानक लगता है
कोई तुम्हें पुकार रहा है
कौन है - किधर, इस सूनी दोपहर में
तुम मुड़कर वृथा देखते हो
कि कोई हौले से तुम्हारा कन्धा थपथपाता है
और तुम देखते हो तनिक चौंके-से
पेड़ है, एक पत्ते की अंगुली से छूता तुम्हें–
एक शरारती दोस्ताना टहोका
और तुम उस पेड़ को शामिल होने देते हो अपने सम्बोधन में
सम्बोधन चिन्ह की जगह.
Word meaning
[सम्बोधन चिन्ह = exclamation mark (!)
वृथा = without any reason, useless
हौले = gently ]
http://anahadnaad.wordpress.com/2008/08/14/gyanendrapati-poem-tram-mein-ek-yaad/
ये कविता इस link से ली गयी है. वैसे तो मुझे ये यहाँ लिखनी नहीं चाहिए, किन्तु इतने सुन्दर शब्द से मैं मंत्रमुग्ध हो गया हूँ ! ज्ञानेन्द्रपति की इस कविता को पढना बहुत ज़रूरी है किसी भी काव्य प्रेमी के लिए…
ट्राम में एक याद
चेतना पारीक कैसी हो ?
पहले जैसी हो ?
कुछ-कुछ खुश
कुछ-कुछ उदास
कभी देखती तारे
कभी देखती घास
चेतना पारीक, कैसी दिखती हो ?
अब भी कविता लिखती हो ?
तुम्हें मेरी याद न होगी
लेकिन मुझे तुम नहीं भूली हो
चलती ट्राम में फिर आँखों के आगे झूली हो
तुम्हारी कद-काठी की एक
नन्ही-सी, नेक
सामने आ खड़ी है
तुम्हारी याद उमड़ी है
चेतना पारीक, कैसी हो ?
पहले जैसी हो ?
आँखों में अब भी उतरती है किताब की आग ?
नाटक में अब भी लेती हो भाग ?
छूटे नहीं हैं लाइब्रेरी के चक्कर ?
मुझ-से घुमंतू कवि से होती है टक्कर ?
अब भी गाती हो गीत, बनाती हो चित्र ?
अब भी तुम्हारे हैं बहुत-बहुत मित्र ?
अब भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो ?
अब भी जिससे करती हो प्रेम उसे दाढ़ी रखाती हो ?
चेतना पारीक, अब भी तुम नन्हीं सी गेंद-सी उल्लास से भरी हो ?
उतनी ही हरी हो ?
उतना ही शोर है इस शहर में वैसा ही ट्रैफिक जाम है
भीड़-भाड़ धक्का-मुक्का ठेल-पेल ताम-झाम है
ट्यूब-रेल बन रही चल रही ट्राम है
विकल है कलकत्ता दौड़ता अनवरत अविराम है
इस महावन में फिर भी एक गौरैया की जगह खाली है
एक छोटी चिड़िया से एक नन्ही पत्ती से सूनी डाली है
महानगर के महाट्टहास में एक हँसी कम है
विराट धक-धक में एक धड़कन कम है कोरस में एक कंठ कम है
तुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते हैं उतनी जगह खाली है
वहाँ उगी है घास वहाँ चुई है ओस वहाँ किसी ने निगाह तक नहीं डाली है
फिर आया हूँ इस नगर में चश्मा पोंछ-पोंछ कर देखता हूँ
आदमियों को किताबों को निरखता लेखता हूँ
रंग-बिरंगी बस-ट्राम रंग-बिरंगे लोग
रोग-शोक हँसी-खुशी योग और वियोग
देखता हूँ अबके शहर में भीड़ दूनी है
देखता हूँ तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है
चेतना पारीक, कहाँ हो कैसी हो ?
बोलो, बोलो, पहले जैसी हो ?
This poem was written on a particularly stormy night. Its a personification of rain, thunder and lightening.
रात कल रात
रात भर रोती रही,
सिसक सिसक कर,
उमड़ उमड़ कर,
कोडे की मार से,
तड़प तड़प कर
word meanings
[ सिसक = sniffing
उमड़ = cry in outbursts
कोडे = whip ( lightening) ]
तुम और मैं
सशंकित प्रतिनिधियों के चुने,
असीमित संभावनाओं
की कसौटी पर खरे,
लेकिन एक दुसरे से
डरे डरे.
भय से अधमरे.
[ सशंकित - unsure
प्रतिनिधियों - representative
असीमित संभावनाओं = infinite possibilities
कसौटी = stone with which a goldsmith ascertains the purity of gold
खरे = passed ]
बहुत सारे लोग पीछे छूट गए हैं,
बहुत सारे रिश्ते टूट गयें हैं,
बहुत सारी यादें,
भूली बिसरी हो गयी हैं,
यादें धुंधली हो गयीं हैं.
मोतिआबिंद आँखें,
स्वप्रतिबिम्ब झाँकें
हम आगे निकल आयें है.
ख्याल बदल गयें है,
सवाल बदल गए हैं,
ख़ास लोग अब इतने याद नहीं आते,
ख़ास अब उनमे, हम कुछ नहीं पाते,
अगर हों भी वो अलग,
तो समय किसके पास है जनाब?
अगर बोरीवली लोकल छूट गयी.
तो जानते हो,
होगा कितना समय खराब?
हम आगे निकल आयें है.
वो बातें अब हो गयी हैं पुरानी,
इतनी पुरानी,
की ‘एक समय की बात है’
ऐसे कह सके हम कहानी
लोगों के नाम अब याद नहीं,
उनके बारे में पता करने का,
अब उतना उन्माद नहीं.
पुरातन लगता नहीं आकर्षक
दिल करता नहीं उनके नाम पे धक् धक्
हम आगे निकल आये हैं.
पुरानी यादें हमेशा रहती अधूरी हैं,
अब बाकी बातें जानना ज्यादा जरूरी है,
मसलन बांद्रा और पार्ला में,
कितने स्टेशन की दूरी है?
और सुंदरी के मूर्ख विचारों पर,
बेसरपैर की बातचीत पे,
कब करनी जी हजूरी है?
क्यूंकि भूत गया है पीछे छूट,
और मैं हुआ हूँ स्मार्ट
पहने सूट बूट
दुनिया करता लूट.
हम आगे निकल आयें है.
(This poem was written in January 2008 while I was walking on the road outside the US Embassy in New Delhi.)
दुनिया मैं हैं अनेक सुंदर चेहरे,
ये बात है मुझे अच्छी तरह पता।
ऐसा नही कि वो सबसे अलग,
ये चीज़ भी अच्छी तरह मैं जानता ।
लेकिन दिल्ली की किसी सड़क पर,
जब एक हवा का झोंका,
उसके बालों को बिखरा देता है,
उसके साथ बैठे हुए-
जाने क्यों,
मन में एक टीस उभर आती है ।
जाने क्यों,
साँस एक पल ही सही,थम सी जाती है
मैं आँखें कहीं और मोड़ लेता हूँ,
जाने क्या सोचने लगता हूँ ……
Word Meaning
{ टीस = nostalgic pain
झोंका = gust of wind }