Oh me!

We are so small between the stars & so large against the sky. and lost in subway croud, I try to catch your eye …..

मैं क्या करूँ ?

November21

अगर २२ मंज़िली ईमारत
कि सोलह माले पर भी
सर्दी कि धूप
मुझे ढूंढ कर गुदगुदा दे
तो मैं क्या करूँ ?

अगर रेल के अंदर बंद बंद भी
कुछ लाल पीले पतझड़ के निशाँ
मेरे muffler से आलिंगनबद्ध
मुझे जाने न दें ,
तो मैं क्या करूँ ?

अगर आज सुबह
तुम्हारी चाय कि गर्मी
इस सूखे दिन को
भर दें जिजीविषा से
तो मैं क्या करूँ ?

( Boston, 11/21/13 )

Two poems by Laltu

October24

Dr. Harjinder Singh, who is perhaps better known by his pen name ‘Laltu’ is a prolific writer and scientist. His biography is available here.

सुबह

सुबह

तुम इतनी साफ कैसे हो

तुम्हारी खिड़कियों पर अदृश्य काँच जड़ा है

तुम हो रेनोआ*  की कृति


चिड़ियों की आवाज़ों में

तुम धीर शांत

कदाचित कहीं दूर कोई गाड़ी की आवाज़

तोड़ती है ओंस भरी नींद ।
इतनी खूबसूरत

तुम्हें कैसे छुऊँ

कहाँ छुऊँ ?

-  Bremmen (Germany), July 2001

* Renoir refers to Pierre-Auguste Renoir, French Impressionist painter.
.

दरख़्त* को क्यों इतनी झेंप

दरख़्त को क्यों इतनी झेंप

जब भी देखूँ

लाज से काँप जाता

.

पूछा भी कितनी बार

छुआ भी सँभल-सँभल

फिर भी आँखें फिसलतीं

पत्ते सरसराकर इधर उधर

झेंप झेंप बुरा हाल।

दरख़्त  = tree

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फूले वनांत के कांचनार

March20

Spring is here! 20th March 2012 will be the day when day and night are exactly 12 hours long. Nature is already starting to bloom – outside my building I see robins and new leaves on trees. Soon, Washington will explode in Cherry Blossom white and then it will be a riot of colors again.

Let’s celebrate spring by reading amodh’s poem of Springtime in 1962 – exactly 50 years young this season! ( This page has been taken from KavitaKosh)

Note: Kachnar looks like this

फूले वनांत के कांचनार !
खेतों के चंचल अंचल से आती रह-रह सुरभित बयार ।
फूले वनांत के कांचनार ।
( वनांत = wilderness)

मिट्टी की गोराई निखरी,
रग-रग में अरुणाई बिखरी,
कामना-कली सिहरी-सिहरी पाकर ओठों पर मधुर भार ।
फूले वनांत के कांचनार !

घासों पर अब छाई लाली,
चरवाहों के स्वर में गाली,
सकुची पगडंडी फैल चली लेकर अपना पूरा प्रसार ।
फूले वनांत के कांचनार !

शाखों से फूटे लाल-लाल,
सेमल के मन के मधु-ज्वाल,

उमड़े पलास के मुक्त हास, गुमसुम है उत्सुक कर्णिकार ।
फूले वनांत के कांचनार !
( कर्णिकार = a wild tree)

मंजरियों का मादक रस पी,
बागों में फिर कोयल कूकी,
उत्सव के गीतों से अहरह मुखरित ग्रामों के द्वार-द्वार ।
फूले वनांत के कांचनार !
(अहरह = daily, continuously)

बगीचा

July5

बुझा बुझा सा है,
मेरा रंगीन बगीचा.
मानो लाल पीला नीला,
Daisy और hydangea ,
सब बदल गए मुरझाए सफ़ेद में.

तुम आओ,
मुस्काओ,
बगीचे में रंग भर दो.

हे मेरी तुम,
अपने रस से,
मुझे फिर से जीवित कर दो..

- 4 जुलाई 2011 , boston

संगीता स्वरुप की कुछ कवितायेँ

June18

संगीता जी दिल्ली में रहती हैं और बिखरे मोती नाम का एक ब्लॉग रखती हैं. http://gatika-sangeeta.blogspot.com/ . सार्थक नाम है इनके ब्लॉग का ! इतनी सुन्दर और कोमल रचनायें पढ़ मन गद-गद हो गया. ये सभी कवितायेँ इनके ब्लॉग से ली गयीं हैं और इनके सर्वाधिकार संगीता जी के पास सुरक्षित हैं. मैं इन्हें केवल non -commercial तरीके से प्रस्तृत कर रहा हूँ…

http://gatika-sangeeta.blogspot.com/2011/03/blog-post_18.html पलाश

पलक पर जमी
शबनम की बूंद को
तर्जनी पर ले कर
जैसे ही तुमने चूमा
मेरी आँखों में
न जाने कितने
पलाश खिल गए ….

http://gatika-sangeeta.blogspot.com/2010/09/blog-post.html

खामोशियाँ
ठहर गयीं हैं
आज
आ कर
मेरे लबों पर

खानाबदोशी की
ज़िंदगी शायद
उन्हें
रास नहीं आई

http://gatika-sangeeta.blogspot.com/2010/07/blog-post_21.हटमल

तमन्ना ने तेरी
होठों पे उंगली
रख कर
जैसे ही कहा

“श्श्शश्श”

सारे मेरे ख्वाब
ठिठक कर
रुक गए…

http://gatika-sangeeta.blogspot.com/2010/03/blog-post_24.हटमल

कल्पना के
इन्द्रधनुष को
किसी क्षितिज की
दरकार नहीं

ये तो
उग आते हैं
मन के
आँगन के
किसी कोने में ….

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ये दिन – केदारनाथ अग्रवाल ( These days by Kedarnath Agrawal)

March22

Kedar often did not name his poems. The first lines were  the name of the poem, something I dont think makes sense. Have thus changed the name of this poem

भूल सकता मैं नहीं

ये कुच-खुले दिन,

ओठ से चूमे गए,

उजले, धुले दिन,

जो तुम्हारे साथ बीते

रस-भरे दिन,

बावरे दिन,

दीप की लौ-से

गरम दिन ।

(My translation follows)

Try yet I cannot forget,

these open breasted days -

kissed by your lips,

these bright, just bathed days.

The ones spent with you,

these sap filled days.

crazy days.

warm, -

warm like the candle flame days.

ऐतिहासिक फ़ासले – Historical Distances by Kunwar Narayan

November21

अच्छी तरह याद है
तब तेरह दिन लगे थे ट्रेन से
साइबेरिया के मैदानों को पार करके
मास्को से बाइजिंग तक पहुँचने में।

अब केवल सात दिन लगते हैं
उसी फ़ासले को तय करने में −
हवाई जहाज से सात घंटे भी नहीं लगते।

पुराने ज़मानों में बरसों लगते थे
उसी दूरी को तय करने में।

दूरियों का भूगोल नहीं
उनका समय बदलता है।

कितना ऐतिहासिक लगता है आज
तुमसे उस दिन मिलना।

===

(My Translation follows)

I distinctly remember,
it took 13 days,
To cross the Trans-Siberian rail,
reaching Beijing from Moscow.

Now it takes only 7 days,
to travel the same distance,
and a flight takes less than 7 hours.

In the ‘old’ times,
It would take years to make that journey

Not the geography of distances,
rather their times change.

Today It feels so historical ,
to have met you that day.

उदासी के रंग – कुंवर नारायण

October25

यह कविता यहा से ली गयी है. ( क़विता कोश)
यह कविता, जो बहुत कम शब्दों में बहुत अधिक कह जाती है, हमे बताती है की कुंवर नारायण को साहित्य अकादमी का सम्मान क्यूँ मिला! बेहद खूबसूरत, कमाल है!

====

उदासी भी
एक पक्का रंग है जीवन का

उदासी के भी तमाम रंग होते हैं

जैसे

फ़क्कड़ जोगिया

पतझरी भूरा

फीका मटमैला

आसमानी नीला

वीरान हरा

बर्फ़ीला सफ़ेद

बुझता लाल

बीमार पीला

कभी-कभी धोखा होता

उल्लास के इंद्रधनुषी रंगों से खेलते वक्त

कि कहीं वे

किन्हीं उदासियों से ही

छीने हुए रंग तो नहीं हैं ?

ये शब्द वही हैं – कुंवर नारायण

October18

यह जगह वही है
जहां कभी मैंने जन्म लिया होगा
इस जन्म से पहले

यह मौसम वही है
जिसमें कभी मैंने प्यार किया होगा
इस प्यार से पहले

यह समय वही है
जिसमें मैं बीत चुका हूँ कभी
इस समय से पहले

वहीं कहीं ठहरी रह गयी है एक कविता
जहां हमने वादा किया था कि फिर मिलेंगे

ये शब्द वही हैं
जिनमें कभी मैंने जिया होगा एक अधूरा जीवन
इस जीवन से पहले।

विरोधी व्यक्तित्व – केदारनाथ अग्रवाल ( 1964 )

August29

This poem has been taken from the book , “Pank aur patwaar”. This talks about the Dr Jeckyll and Mr Hyde type twin personalities of a person. It is interesting to see how this duality may mean different things. I think Kedar talks about how our socio-economic consciousness restraints us when we try to follow things that make us happy.

खुल गया हूँ मैं ,
धुप में धान के खेत की तरह
हर्ष से हरा-भरा,
भीतर-बाहर लहरा.

मुझे देखता है,
मेरा ही विरोधी व्यक्तित्व,
लालची निगाहों से,
काटकर ले जाने के लिए,
हाट* में बेचकर,
पैसे कमाने के लिए

हाट = weekly village market.

सध्य्स्रात तुम – दुष्यंत कुमार

June4

I am reading about astronomy these days, what are nakshatras, asterisms etc. Here is a poem by Dushyant Kumar, very much different from his usual style, that talks about eclipse and a women’s beauty. I find these poems, that club human love with Nature’s beauty, to be brilliant.

सध्य्स्रात तुम,
जब आती हो,
मुख कुन्तलों से ढका रहता है,
बहुत बुरे लगते हैं वो क्षण जब,
राहू से काल ग्रसा रहता है* !
( सध्य्स्रात = one who has just bathed ,
.कुन्तल = hair
राहू = an imaginary planet/demon which eats up sun and moon causing solar/lunar eclipses )

पर जब तुम
केश झटक देती हो अनायास
तारों सी बूँदें
बिखर जातीं हैं आसपास
मुक्त हो जाता है चाँद*
तब बहुत भला लगता है!

( अनायास = sudden
* this refers to passing of an eclipse )

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बादल और पौधे

June2

I just read this poem in the train. Monsoon is about to arrive… and
I find these words to be the most innocent expression of related
happiness

This poem has been taken from केदारनाथ अग्रवाल’s book – ” पंख और
पतवार”, published in 1980.

बादल और पौधे

पौधे,
बतियातें है पत्तों से,
बादल से कहते हैं-
आओ जी,
आओ जी,
आओ!

बादल,
धमकाते है बिजली से,
पौदों से कहते हैं-
ठहरो जी,
ठहरो जी,
ठहरो !

पौधे,
घबराते हैं गर्मी से,
बादल से कहते हैं-
बरसो जी,
बरसो जी
बरसो !

बादल,
घहराते है करुना से,
पौदों से कहते हैं-
पानी लो,
पानी लो,
पानी !

पौधे,
लहराते हैं लहरों से,
बादल से कहते हैं-
सागर है,
सागर है,
सागर!

प्यासा कुआँ – The thirsty well

March14

लोग कैसे लिख पाते हैं इतने सुन्दर शब्द? मैं हैरान हूँ! कैसे कवि ने “एक बुढाए कुआँ ” कह उसे एक व्यक्तित्व दे दिया है! आह! नमस्तुते कवि, नमस्तुते!

यह कविता http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%86%E0%A4%81_/_%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF से ली गयी है

प्यास बुझाता रहा था जाने कब से
बरसों बरस से
वह कुआँ
लेकिन प्यास उसने तब जानी थी
जब
यकायक बंद हो गया जल-सतह तक
बाल्टियों का उतरना
बाल्टियाँ- जो अपना लाया आकाश डुबो कर
बदले में उतना जल लेती थीं

प्यास बुझाने को प्यासा
प्रतीक्षा करता रहा था कुआँ, महीनों
तब कभी एक
प्लास्टिक की खाली बोतल
आ कर गिरी थी
पानी पी कर अन्यमनस्क फेंकी गई एक प्लास्टिक-बोतल
अब तक हैण्डपम्प की उसे चिढ़ाती आवाज़ भी नहीं सुन पड़ती

एक गहरा-सा कूड़ादान है वह अब
उसकी प्यास सिसकी की तरह सुनी जा सकती है अब भी
अगर तुम दो पल उस औचक बुढ़ाए कुएँ के पास खड़े होओ चुप।

[ Word meanings
यकायक = suddenly
जल-सतह = water surface
अन्यमनस्क = the feeling of finding something useless / absent mindedly
सिसकी = sniffle
औचक = surprised/ sudden ]

नए गगन में – नागार्जुन

March11

गुलरभोज में बाबा के कमरे में एक चित्र टंगा था. उगते हुए लाल सूर्य का चित्रण था. साथ ही एक कविता की ये पंक्तियाँ भी थी -

” नए गगन में,
नया सूरज जो चमक रहा है,
ये विशाल भूखंड,
आज जो दमक रहा है,

मेरी भी आभा है इसमें ! “

संध्या ( The Evening)

September26

Evening happens to be my favourite time of the day. I find Nature to be most beautiful in the golden rays of sunset.

I especially like to roam aimlessly in the streets of kalanagar (bandra east) at about 6 PM.

This poem words what I feel every evening.

सूरज की  किरणे,हर शाम,
अपनी आखरी सासें गिनती हैं,
अपने हरे भरे जग को,
सुन्दर पेड़, सुन्दर सड़क,
और तृप्त वातावरण को,
देखती है विरह दुःख के साथ. 

समाप्त हो जातीं है तब,
मेरी सारी अधूरी इच्छाएं,
और  होता है मुझे,
क्षणिक,
क्षणभन्गुर
सुख का एहसास.
Word Meanings
[तृप्त वातावरण = Satisfied Environment
विरह दुःख = Sadness of leaving dear ones behind
क्षणिक = Momentary (for a second)
क्षणभन्गुर = Ephemeral ]
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सम्बोधन चिन्ह (ज्ञानेन्द्रपति )

September1

( This poem has been taken from http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A4%A8_%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%B9_/_%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF )

There are poems on love. There are poems on Nature. But there are some poems which coalesce both human love and the beauty of nature to produce something that ‘hits’ you. )

सम्बोधन चिन्ह

दिन की फुर्सत के फैलाव-बीच उगे

एक पेड़ के तने से

पीठ टिका कर

जब तुम एक प्रेम-पत्र लिखना शुरू करते हो

कुछ सोचते और मुस्कुराते हुए

तुम्हें अचानक लगता है

कोई तुम्हें पुकार रहा है

कौन है – किधर, इस सूनी दोपहर में

तुम मुड़कर वृथा देखते हो

कि कोई हौले से तुम्हारा कन्धा थपथपाता है

और तुम देखते हो तनिक चौंके-से

पेड़ है, एक पत्ते की अंगुली से छूता तुम्हें–

एक शरारती दोस्ताना टहोका

और तुम उस पेड़ को शामिल होने देते हो अपने सम्बोधन में

सम्बोधन चिन्ह की जगह.

Word meaning

[सम्बोधन चिन्ह = exclamation mark (!)

वृथा = without any reason, useless

हौले =  gently ]

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मानसून की एक रात

July17

This poem was written on a particularly stormy night.  Its a personification of  rain, thunder and lightening.

रात कल रात
रात भर रोती रही,
सिसक सिसक कर,
उमड़ उमड़ कर,

कोडे की मार से,
तड़प तड़प कर

word meanings

[ सिसक = sniffing

उमड़ = cry in outbursts

कोडे = whip ( lightening) ]

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