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गुलरभोज में बाबा के कमरे में एक चित्र टंगा था. उगते हुए लाल सूर्य का चित्रण था. साथ ही एक कविता की ये पंक्तियाँ भी थी -

” नए गगन में,
नया सूरज जो चमक रहा है,
ये विशाल भूखंड,
आज जो दमक रहा है,

मेरी भी आभा है इसमें ! “