Oh me!

We are so small between the stars & so large against the sky. and lost in subway croud, I try to catch your eye …..

स्मृति

February7

भागता गया मैं
रात और दिन
उत्तर दक्षिण , पूरब पश्चिम

हिंदुस्तान से अमरीका
अमरीका से कंबोडिया
कैम्ब्रिज से नेटिक
और फिर नेटिक से कैम्ब्रिज
रटगर्स से हार्वर्ड
रेड लाइन से ग्रीन लाइन
एटलांटिक से प्रशांत
दिन प्रतिदिन
मौसम से मौसम
साल प्रति साल

मैंने मदद मांगी
फूलों से और पेड़ों से
नदियों से, पहाड़ियों से
मेपल से ओक से
कल्पतरु से
सूरज की किरणों से
ब्रह्माण्ड क नक्षत्रों से

कोई न बचा पाया
कोई न छुपा पाया
तुम्हारी स्मृति से

तुम्हारी यादें
काल और समय की
सीमाओं को नहीं पहचानती
वे स्वयं
ईश्वर से हार नहीं मानतीं

 

( Cambridge, 7 Feb 2016 )

Stayin’ alive

December10

Was it the wind tossing your brown hair

like a kite desperate to fly,

or was it you saying your usual things,

“what’s wrong with you!”

with your mischivious eyes?

I cant decide, it a tie

what makes me happy to be stayin’ alive.

( Boston : December 10, 2015)

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ये शफ़क़ चाँद सितारे नहीं अच्छे लगते

December5

A beautiful ghazal by Indra Verma. Taken from Kavitakosh. The ghazal has all the things i love : simple words, deep emotions, and (some) element of nature. Translations in brackets. Probably written in 70s/80s ?

ये शफ़क़ चाँद सितारे नहीं अच्छे लगते
तुम नहीं हो तो नज़ारे नहीं अच्छे लगते

[ शफ़क़ = twilight ]
गहरे पानी में ज़रा आओ उतर कर देखें
हम को दरिया के किनारे नहीं अच्छे लगते

रोज़ अख़बार की जलती हुई सुर्ख़ी पढ़ कर
शहर के लोग तुम्हारे नहीं अच्छे लगते

दर्द में डूबी फ़ज़ा आज बहुत है शायद
ग़म-ज़दा रात है तारे नहीं अच्छे लगते
[ फ़ज़ा = ambiance,  ग़म-ज़दा = enveloped in sadness ]
मेरी तन्हाई से कह दो के सहारा छोड़े
ज़िंदगी भर ये सहारे नहीं अच्छे लगते

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हफ्ते भर

December2

हफ्ते भर तुम्हारी याद आती रही
हफ्ते भर नींद से मुझे जगाती रही
कितनी कोशिश की , भाग जाऊं कहीं बहुत दूर
लेकिन फांसी के फंदे जैसी
मेरा रुँधा गला दबाती रही.

( Boston, 3 Dec 15 )

Kettering

October7

This song is stuck in my mind, and refuses to go unless I pen down the lyrics:

 

I wish that I had known
in that first minute we met
the unpayable debt
that I owed you

Because you’d been abused
by the bone that refused you
and you hired me
to make up for that

You said you hated my tone
it made you feel so alone
so you told me
I ought to be leaving

You made me sleep all uneven
and I didn’t believe them
when they told me that there
was no saving you…

( The Antlers, 2009 )

 

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मैं नहीं समझ पाता

June28

ये कोई आवश्यक तो नहीं
की हर बार जब तुम मुझसे मिलो
तुम कुछ ऐसा करो
की मेरा विवादित मन निरुत्तर हो जाए

क्यों तुम हो जाती हो भावुक
करुणा से भर
जब मैं होता हूँ दुखी

भला क्यों तुम मुझसे
करती हो इतना प्रेम
मुझे नहीं समझ आता
असमंजस में ये दिन बीता जाता

 

( Yale University, New Haven : 6/27/2015 )

Joy and sorrow

May20

Mr. Govind Mathur is one of the finest poets of contemporary Hindi literature. Here’s the last paragraph of a poem, accompanied by my attempt at translation.  Taken from Author’s website at http://govind-mathur.blogspot.com/ . Copyright reserved by Govind Mathur.

दुःख व्यापक और
वर्गहीन है
दूसरों के दुःख से
हम दुखी हो सकते है
दूसरों के सुख से ‘
हम सुखी नहीं होते

[ रविवारीय ‘ जनसत्ता ‘ दिनांक १२  अक्टूम्बर ‘ २०१४ में  प्रकाशित  ]

My translation follows:

Sorrow transcends geographies

and social classes.

We might turn unhappy,

when we see others sad

However the joy of others

Doesnt lift our spirits..

( Boston, 05/20/2015)

कोई जरूरत नहीं थी

March22

कोई जरूरत नहीं थी
दो सौ मील दूर आकर
मेरी मदद करने की.

न ही ज़रूरी था
मुझे कहना
सब ठीक हो जायेगा

न मेरे बालों को
सहलाने की जरूरत थी
और ना ही मुझे
वैसे देखना चाहिए था.

Sangria में थोड़ी चीनी
के बिना भी काम चल जाता
और महफ़िल में लोग
थोड़ा सा कम खाना
खा सकते थे।

बसंत के पहले दिन
तुम्हे नहीं होना चाहिए था मेरे साथ
सूरज की मुलायम धूप
तुम्हे भूलने नहीं देती है.
अब पूरा साल कम पड़ेगा
तुम्हारी शुक्रगुजारी के लिए
तुम्हे कुछ और प्यार करने के लिए…

( Natick, 03/22/15 )

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Protected: अब तुम रूठो / गोपालदास नीरज

November21

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प्यार के तरीके

November13

♂ ” मैंने तो तुम्हे इतना प्यार किया,,, और आज भी करता हूँ, मुझे अभी भी समझ नहीं आता की तुम्हे इतना प्यार करने के बावजूद हम यहाँ कैसे पहुँच गये.  :'( ”
♀ “ हमारे प्यार करने के तरीके अलग हैं ”

Boston, 11/12/2014

=====

सुनता हूँ की प्यार करने का एक तरीका होता है

ऐसे  नहीं, की दूसरा pressure में आ जाए

प्यार को तर्कसंगत होना चाहिए,

सधा होना चाहिए।

 

ये नहीं की ले लो उसे आगोश में कभी भी

पार्क में बैठे हुए थोड़ी तमीज़ से पेश आना चाहिए

ये नहीं की खाना बनाते हुए परेशान करते रहो   ,

इश्क करने का सही समय होना चाहिए

 

वो तुम्हे हर वक़्त ILU नहीं कह सकती

और न चाहती है की तुम हमेशा कहो ऐसा उसे

हर वक़्त excited  रहने की कोई जरूरत नहीं है,

आखिर हम कोई 15 साल के बच्चे नहीं हैं

 

हम 30  साल के हैं  – परिपक्व और शांत

जैसे मेरे घर के सामने बहती चार्ल्स नदी

जैसे बालकनी में रखी दो कुर्सियां

जैसे सर्दी के मौसम में हिमाद्रित पेड़

जैसे कमरे में चुपचाप पड़ी दराज़

 

ये चाय पीने जैसा है

गर्म पानी में भीगने दो Teabag को,

और उसमे फिर डालो आधा चम्मच चीनी

और थोडा सा half-and-half

कोई अजमेर  रेलवे स्टेशन  नहीं

की एक ही पतीले की गन्दी चाय

दिन भर गर्म करते रहो

 

बेवक़ूफ़ दिल

लाख समझा लो उसे सुसंस्कृत Starbucks  के फायेदे

उसे अजमेर रेलवे स्टेशन की चाय ही पसंद आती है।

 

Boston , 6 सितम्बर 2013

 

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आज उसे फिर याद किया /

November6

आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया
बंद गली के आख़िरी घर को खोल के फिर आबाद किया

खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों से
रंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया

बड़े बड़े ग़म खड़े हुए थे रस्ता रोके राहों में
छोटी छोटी ख़ुशियों से ही हम ने दिल को शाद किया

बात बहुत मामूली सी थी उलझ गई तकरारों में
एक ज़रा सी ज़िद ने आख़िर दोनों को बर्बाद किया

दानाओं की बात न मानी काम आई नादानी ही
सुना हवा को पढ़ा नदी को मौसम को उस्ताद किया

( निदा फ़ाज़ली, 1970s ?)

Taken from Kavitakosh.

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सूर्यास्त

October25

समुन्दर किनारे
शुरू करता हूँ
मैं सूर्यास्त देखना

लहर आती जाती हैं
विचार आते जाते हैं
लोग आते जाते हैं
लेकिन मैं ठहर जाता हूँ

आश्चर्यचकित, मैं पाता हूँ,
पैरों को रेत में आधा गढ़ा
अतीत और भविष्य के बीच
आधा ज़िंदा, आधा मरा

( Boston, 10/24/2014 )

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Suppose

September19

And suppose I never ever met you
Suppose we never fell in love
Suppose I never ever let you kiss me so sweet and so soft
Suppose I never ever saw you
Suppose we never ever called
Suppose I kept on singing love songs just to break my own fall
Just to break my fall
Just to break my fall
Break my fall
Break my fall

 

( Regina Spektor, “Fidelity”  2006)

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घर छोड़ना

August22

“निकलना खुल्द से आदम का सुना था हमने,
पर बड़े बे-आबरू हो तेरे कूचे से हम निकले (ग़ालिब )”

—  —   —   —  —  —   —

 

ज़्यादा समय नहीं लगता
अपना बोरिआ बिस्तर बाँधने में

कुल जमा एक अलमारी का सामान है
और दो सूटकेस काफी हैं
अपनी किताबों, कपड़ों, डाक टिकट
डायरी और जूते रखने के लिए

आधे घंटे सामान रखो
और ज़िन्दगी भर सोचते रहो
क्या छोड़ आया, क्या ले आया

ढाई बजे की धुप मखमली है
चार्ल्स नदी सतत बहती है.

 

( Boston, 8/22/2014 )

उम्र – सुलोचना वर्मा

August19

मेरे तुम्हारे बीच
आकर ठहर गया है
एक लम्बा मौन
छुपी हैं जिसमे
उम्र भर की शिकायतें

हर एक शिकायत की
है अपनी अपनी उम्र

उम्र लम्बी है शिकायतों की
और उम्र से लम्बा है मौन

( 2014 )

Taken from Kavitakosh Also available at Poetess’ blog here.

English अष्टपदी

June6

Wild winter, warm coffee
Mom’s gone, do you love me?
Blazing summer, cold coffee
Baby’s gone, do you love me?

 

– Sylvan Esso, Coffee

Video : https://www.youtube.com/watch?v=Qr5AIKRPIHo&feature=kp

Spotify :   Sylvan Esso – Coffee

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आभार – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

May20

this poem has been taken from here.

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं,
सीमित पग डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं।
दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रसाद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

साँसों पर अवलम्बित काया, जब चलते-चलते चूर हुई,
दो स्नेह-शब्द मिल गये, मिली नव स्फूर्ति, थकावट दूर हुई।
पथ के पहचाने छूट गये, पर साथ-साथ चल रही याद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

जो साथ न मेरा दे पाये, उनसे कब सूनी हुई डगर?
मैं भी न चलूँ यदि तो क्या, राही मर लेकिन राह अमर।
इस पथ पर वे ही चलते हैं, जो चलने का पा गये स्वाद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

कैसे चल पाता यदि न मिला होता मुझको आकुल अंतर?
कैसे चल पाता यदि मिलते, चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर!
आभारी हूँ मैं उन सबका, दे गये व्यथा का जो प्रसाद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

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To a poet a thousand years hence

April12

I who am dead a thousand years,
And wrote this sweet archaic song,
Send you my words for messengers
The way I shall not pass along.

I care not if you bridge the seas,
Or ride secure the cruel sky,
Or build consummate palaces
Of metal or of masonry.

But have you wine and music still,
And statues and a bright-eyed love,
And foolish thoughts of good and ill,
And prayers to them who sit above?

How shall we conquer? Like a wind
That falls at eve our fancies blow,
And old Moeonides the blind
Said it three thousand years ago.

O friend unseen, unborn, unknown,
Student of our sweet English tongue,
Read out my words at night, alone:
I was a poet, I was young.

Since I can never see your face,
And never shake you by the hand,
I send my soul through time and space
To greet you. You will understand.

 

By James Elroy Flecker  in 1911. The poem has been taken from Project Gutenberg.

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I am That – Swami Raamteertha

December13

I have no scruple of change, nor fear of death,
Nor was I ever born,
Nor had I parents.
I am Existence Absolute, Knowledge Absolute, Bliss Absolute,
I am That, I am That,

I cause no misery, nor am I miserable;
I have no enemy, nor am I enemy.
I am Existence Absolute, Knowledge Absolute, Bliss Absolute,
I am That, I am That,

I am without form, without limit,
Beyond space, beyond time,
I am in everything, everything is in me.
I am the bliss of the universe,
Everywhere am I.
I am Existence Absolute, Knowledge Absolute, Bliss Absolute,
I am That, I am That,

I am without body or change of the body,
I am neither senses, nor object of the senses,
I am Existence Absolute, Knowledge Absolute, Bliss Absolute,
I am That, I am That,

I am neither sin, nor virtue,
Nor temple, nor worship
Nor pilgrimage, nor books.
I am Existence Absolute, Knowledge Absolute, Bliss Absolute,
I am That, I am That,

 

( Taken from here.  Author’s biography is here. )

आलिंगन

December4

तुमसे नाराज़ हो , मैं सोचता हूँ
कितनी खरी खोटी सुनानी है तुम्हे
कितना लड़ना है
कितना ह्रदय दुखाना है तुम्हारा ….

लेकिन शाम मैं घर आता हूँ
और तुम आलिंगनबद्ध करती हो मुझे ….
मैं भूल जाता हूँ
अपने आप से किये वादे
आह ! मैं दुःखी न रह पाता हूँ
अपने को तुम्हारे प्रेम में बावरा पाता हूँ।

 

( Boston, 3  Dec 2013 )

 

Like mist

November22

Your thoughts pass through my soul

like the mist near Atlantic Wharf

they appear from nowhere

fill me with countless drops

of unbridled swirling emotions

and dissapear in nothingness.

The sun wonders

not a drop has rained

yet I am drenched.

 

( Boston, 11/22/13 )

 

 

 

 

मैं क्या करूँ ?

November21

अगर २२ मंज़िली ईमारत
कि सोलह माले पर भी
सर्दी कि धूप
मुझे ढूंढ कर गुदगुदा दे
तो मैं क्या करूँ ?

अगर रेल के अंदर बंद बंद भी
कुछ लाल पीले पतझड़ के निशाँ
मेरे muffler से आलिंगनबद्ध
मुझे जाने न दें ,
तो मैं क्या करूँ ?

अगर आज सुबह
तुम्हारी चाय कि गर्मी
इस सूखे दिन को
भर दें जिजीविषा से
तो मैं क्या करूँ ?

( Boston, 11/21/13 )

Atlas wants to heal.

November19

Throw away the weights

Of incessant guilt

Atlas is tired of suffering

Atlas wants to stand straight

Atlas wants to heal.

 

Boston, 11/19/13

परिचय ( रामधारी सिंह दिनकर ) १९०८ – १९७४

October16

सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं
स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं
बँधा हूँ, स्वपन हूँ, लघु वृत हूँ मैं
नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं

समाना चाहता है, जो बीन उर में
विकल उस शुन्य की झनंकार हूँ मैं
भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में
सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं

जिसे निशि खोजती तारे जलाकर
उसीका कर रहा अभिसार हूँ मैं
जनम कर मर चुका सौ बार लेकिन
अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं

कली की पंखुडीं पर ओस-कण में
रंगीले स्वपन का संसार हूँ मैं
मुझे क्या आज ही या कल झरुँ मैं
सुमन हूँ, एक लघु उपहार हूँ मैं

मधुर जीवन हुआ कुछ प्राण! जब से
लगा ढोने व्यथा का भार हूँ मैं
रुंदन अनमोल धन कवि का, इसी से
पिरोता आँसुओं का हार हूँ मैं

मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का
चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं
पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी
समा जिस्में चुका सौ बार हूँ मैं

न देंखे विश्व, पर मुझको घृणा से
मनुज हूँ, सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं
पुजारिन, धुलि से मुझको उठा ले
तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं

सुनुँ क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा
स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का
प्रलय-गांडीव की टंकार हूँ मैं

दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा का
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं
सजग संसार, तू निज को सम्हाले
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं

बंधा तुफान हूँ, चलना मना है
बँधी उद्याम निर्झर-धार हूँ मैं
कहूँ क्या कौन हूँ, क्या आग मेरी
बँधी है लेखनी, लाचार हूँ मैं।।

 

(From  कविताकोश  )

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तुम कभी थे सूर्य / चंद्रसेन विराट

September13

This post has been taken from Kavitakosh 

 

तुम कभी थे सूर्य लेकिन अब दियों तक आ गये।
थे कभी मुख्पृष्ठ पर अब हाशियों तक आ गये ॥

प्रेम के आख्यान मे तुम आत्मा से थे चले ।
घूम फिर कर देह की गोलाईयों तक आ गये ॥

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तुम पड़ी हो by केदारनाथ अग्रवाल

May29

The original text is taken from Kavitakosh

तुम पड़ी हो शान्त सम्मुख

स्वप्नदेही दीप्त यमुना

बाँसुरी का गीत जैसे पाँखुरी पर

पौ फटे की चेतना जैसे क्षितिज पर

मैं तुम्हें अवलोकता हूँ ।

 

(My translation follows)

You lie peaceful on the bed

your body supine,

like a dream –

like the gleaming ganges in the evening sun

like the sound of a flute made of flowers

like the truth of dawn on horizon

I only look at you…

 

Boston, 5/29/13

Leave me as I am – Rita Petro

March26

( Taken from  http://www.albanianliterature.net/authors_modern1/petro_poetry.html)

Hindi translation has been taken from here. Translator: Siddheshwar Singh

रहने दो मुझे जैसी हूँ मैं
अगर नींद मुझे पकड़  लेती है पेड़ों के बीच
हो सकता मैंने पहने हों आधे – अधूरे कपड़े
रहने दो मुझे जैसी हूँ मैं।

पे्ड़ों को और मुझे भी
भाता है पहनने और निर्वसन होने का कौतुक
वे सूर्य के समक्ष करते हैं यह काम
और मैं तुम्हारे।

===

Leave me as I am,
If sleep finds me between those trees,
Even though I am only half-dressed,
Leave me as I am!
The trees and I
Love to dress and undress.
They do it in front of the sun,
I do it in front of you.

[Lermë kështu siç jam, from the volume Vargje të përfolura, Tirana 1994, p. 11. Translated from the Albanian by Robert Elsie]

पूर्णविराम

December16

ये उचित ही है,
की संबंधों के समाप्त होने पर,
सोचना बंद कर दिया जाये.
अर्धविराम से कहीं बेहतर है पूर्णविराम.

अधूरी अपेक्षाओं से,
किसी का उद्धार हुआ है कभी?

अर्धविराम = comma (,)
पूर्णविराम = period (.)

Boston / San Francisco , May 31, 2012.

Two poems by Laltu

October24

Dr. Harjinder Singh, who is perhaps better known by his pen name ‘Laltu’ is a prolific writer and scientist. His biography is available here.

सुबह

सुबह

तुम इतनी साफ कैसे हो

तुम्हारी खिड़कियों पर अदृश्य काँच जड़ा है

तुम हो रेनोआ*  की कृति


चिड़ियों की आवाज़ों में

तुम धीर शांत

कदाचित कहीं दूर कोई गाड़ी की आवाज़

तोड़ती है ओंस भरी नींद ।
इतनी खूबसूरत

तुम्हें कैसे छुऊँ

कहाँ छुऊँ ?

–  Bremmen (Germany), July 2001

* Renoir refers to Pierre-Auguste Renoir, French Impressionist painter.
.

दरख़्त* को क्यों इतनी झेंप

दरख़्त को क्यों इतनी झेंप

जब भी देखूँ

लाज से काँप जाता

.

पूछा भी कितनी बार

छुआ भी सँभलसँभल

फिर भी आँखें फिसलतीं

पत्ते सरसराकर इधर उधर

झेंप झेंप बुरा हाल।

दरख़्त  = tree

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for you.

August20

I’m late for the 7:55 train ,

will perhaps miss 8:19 too

Sunlight dancing through glass panes

asks, “Bhaiyyu, where are you?”

.

Its Autumn and the leaves of Maple

are dressed in a hundred shades of yellow

The ice cream truck is again on my street,

downstairs someone plays ‘The entertainer’ mellow

.

The world keeps enticing me

via its giggles, suggestions, chatters

but lying next to you my darling,

hardly anything matters.

.

– Cambridge, Massachusetts.  20 August 2012.

याद आया

August12
पिछली बारिश में धीमे भीगना याद आया,
तेरे साथ New York की सड़कों पर चलना याद आया.
.
हवा से बात करती मेरी पुरानी गाडी,
और तेरी जुल्फों का खुलना याद आया.
.
Central Park में बैठे हम और तुम,
पीछे Tulips का खिलना याद आया.
.
कतील शिफाई से Walt Whitman तलक,
तेरी खूबसूरती, तेरा मीठा बोलना याद आया .
.
इन्द्रधनुष में समायें हैं मदहोशी के सात रंग,
आज जो सोचा तेरे बारे, तो एक एक याद आया.
– Boston, 11 August 2012

Not written about anyone, Art for Art’s sake.

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Cherry Blossom poem

June26

cherry-blossom

The Light Filling the air

is so mild this Spring day

only the Cherry Blossoms

Keep falling in haste –

why is that so?

– Ki no Tomonori,  C850 -904 AD

Image is copyrighted and has been taken from this page

नदी by शंभुनाथ_सिंह

June21

गंगा तट पर बैठे, मैंने अक्सर यही सोचा है. मेरे से पहले भी नदी थी, मेरे बाद भी रहेगी. प्रलय के बाद भी रहेगी. कितना क्षणभंगुर है मनुष्य जीवन!

एक मीनार उठती रही
एक मीनार ढहती रही
अनरुकी अनथकी सामने
यह नदी किन्तु बहती रही

पर्वतों में उतरती हुई
घाटियाँ पार करती हुई,
तोड़ती पत्थरों के क़िले
बीहड़ों से गुज़रती हुई,

चाँद से बात करती रही
सूर्य के घात सहती रही ।

धूप में jhilmilati  हुई
छाँव में गुनगुनाती हुई,
पास सबको बुलाती हुई
प्यास सबकी बुझाती हुई,

ताप सबका मिटाती हुई
रेत में आप दहती रही ।

बारिशों में उबलती हुई
बस्तियों को निगलती हुई,
छोड़ती राह में केंचुलें
साँप की चाल चलती हुई ।

हर तरफ़ तोड़ती सरहदें,
सरहदों बीच रहती रही ।

सभ्यताएँ बनाती हुई
सभ्यताएँ मिटाती हुई,
इस किनारे रुकी ज़िंदगी
उस किनारे लगाती हुई ।

कान में हर सदी के नदी
अनकही बात कहती रही ।

अब जबकि तुम इस शहर में नहीं हो ( शरद बिलौरे )

April26

(कवि मात्र 25 साल के थे जब 1982 में लू लगने से उनका निधन हो गया. )

इस कविता को समझने के लिए प्रेम में होना (या किसी समय रहा होना ) आवश्यक है. साधू!

कविताकोश के साभार ली गयी है ये रचना.

===

हफ़्ते भर से चल रहे हैं
जेब में सात रुपये
और शरीर पर
एक जोड़ कपड़े

एक पूरा चार सौ पृष्ठों का उपन्यास
कल ही पूरा पढ़ा,
और कल ही
अफ़सर ने
मेरे काम की तारीफ़ की।

दोस्तों को मैंने उनकी चिट्ठियों के
लम्बे-लम्बे उत्तर लिखे
और माँ को लिखा
कि मुझे उसकी ख़ूब-ख़ूब याद आती है।

सम्वादों के
अपमान की हद पार करने पर भी
मुझे मारपीट जितना
गुस्सा नहीं आया

और बरसात में
सड़क पार करती लड़कियों को
घूरते हुए मैं झिझका नहीं

तुम्हें मेरी दाढ़ी अच्छी लगती है
और अब जबकि तुम
इस शहर में नहीं हो
मैं
दाढ़ी कटवाने के बारे में सोच रहा हूँ।

सम्बन्ध by आभा बोधिसत्त्व

April15

यह कविता “कविताकोश” से ली गयी है. आभा बोधिसत्त्व जी दांपत्य जीवन के मर्म को समझती हैं, इस कविता के द्वारा….

चलो हम दीया बन जाते हैं
और तुम बाती …

हमें सात फेरों या कि “कुबूल है” से
क्या लेना-देना

हमें तो बनाए रखना है
अपने दिया-बाती के
सम्बन्ध को……… मसलन रोशनी

हम थोड़ा-थोड़ा जलेंगे
हम खो जाएँगे हवा में
मिट जाएगी फिर रोशनी भी हमारी
पर हम थोड़ी चमक देकर ही जाएँगे
न ज़्यादा सही कोई भूला भटका
खोज पाएगा कम से कम एक नेम-प्लेट
या कोई पढ़ पाएगा ख़त हमारी चमक में ।

तो क्या हम दीया बन जाए
तुम मंजूर करते हो बाती बनना।
मंजूर करते हो मेरे साथ चलना कुछ देर के लिए
मेरे साथ जगर-मगर की यात्रा में चलना….कुछ पल।

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फूले वनांत के कांचनार

March20

Spring is here! 20th March 2012 will be the day when day and night are exactly 12 hours long. Nature is already starting to bloom – outside my building I see robins and new leaves on trees. Soon, Washington will explode in Cherry Blossom white and then it will be a riot of colors again.

Let’s celebrate spring by reading amodh’s poem of Springtime in 1962 – exactly 50 years young this season! ( This page has been taken from KavitaKosh)

Note: Kachnar looks like this

फूले वनांत के कांचनार !
खेतों के चंचल अंचल से आती रह-रह सुरभित बयार ।
फूले वनांत के कांचनार ।
( वनांत = wilderness)

मिट्टी की गोराई निखरी,
रग-रग में अरुणाई बिखरी,
कामना-कली सिहरी-सिहरी पाकर ओठों पर मधुर भार ।
फूले वनांत के कांचनार !

घासों पर अब छाई लाली,
चरवाहों के स्वर में गाली,
सकुची पगडंडी फैल चली लेकर अपना पूरा प्रसार ।
फूले वनांत के कांचनार !

शाखों से फूटे लाल-लाल,
सेमल के मन के मधु-ज्वाल,

उमड़े पलास के मुक्त हास, गुमसुम है उत्सुक कर्णिकार ।
फूले वनांत के कांचनार !
( कर्णिकार = a wild tree)

मंजरियों का मादक रस पी,
बागों में फिर कोयल कूकी,
उत्सव के गीतों से अहरह मुखरित ग्रामों के द्वार-द्वार ।
फूले वनांत के कांचनार !
(अहरह = daily, continuously)

शेष होते हुए

December16

A beautiful poem on ending relationships/ divorce by Govind mathur. This has been taken from Kavitakosh. This poem and the collection) got the poet Rajasthan Sahitya Academy award in 1986.

A simple poem, but very deep. Mr Mathur blogs at http://www.govind-mathur.blogspot.com/

इस तरीके से नही
पहले हमें
सहज होना होगा
किसी तनाव में
टूटने से बेहतर है
धीरे-धीरे
अज्ञात दिशाओं में
गुम हो जाएँ

हमारे सम्बन्ध
कच्ची बर्फ से नही
कि हथेलियों में
उठाते ही पिघल जाएँ
आख़िर हमने
एक-दूसरे की
गर्माहट महसूस की है

इतने दिनों तक
तुमने और मैंने
चौराहे पर खड़े हो कर
अपने अस्तित्व को
बनाए रखा है
ये ठीक है कि
हमें गुम भी
इस ही
चौराहे से होना है

पर इस तरीके से नही
पहले हमें
मासूम होना होगा
उतना ही मासूम
जितना हम
एक दूसरे से
मिलने के पूर्व थे

पहले मैं या तुम
कोई भी
एक आरोप लगाएंगे
न समझ पाने का
तुम्हें या मुझे
और फिर
महसूस करेगें
उपेक्षा
अपनी-अपनी

कितना आसान होगा
हमारा अलग हो जाना
जब हम
किसी उदास शाम को
चौराहे पर मौन खड़े होंगे

और फिर जब
तुम्हारे और मेरे बीच
संवाद टूट जएगा
कभी तुम चौराहे पर
अकेले खड़े होगें
और कभी मैं

फिर धीरे-धीरे
हमें एक दूसरे की
प्रतीक्षा नही होगी
कितना सहज होगा
हमारा अजनबी हो जाना
जब हम सड़कों और गलियों में
एक दूसरे को देख कर
मुस्करा भर देंगे
या हमारा हाथ
एक औपचारिकता में
उठ जाया करेगा

हाँ हमें
इतनी जल्दी भी क्या है
ये सब
सहज ही हो जाएगा
फिर हमें
बीती बातों के नाम पर
यदि याद रहेगा तो
सिर्फ़
एक-दूसरे का नाम

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तितली

July14

तुम तितली हो
इठलाती, बल खाती
मुझे बावरा कर मंडराती,
हे मेरी तुम,
तुम मेरे जीवन की रागिनी हो.

Boston , 13 जुलाई 2011

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बगीचा

July5

बुझा बुझा सा है,
मेरा रंगीन बगीचा.
मानो लाल पीला नीला,
Daisy और hydangea ,
सब बदल गए मुरझाए सफ़ेद में.

तुम आओ,
मुस्काओ,
बगीचे में रंग भर दो.

हे मेरी तुम,
अपने रस से,
मुझे फिर से जीवित कर दो..

– 4 जुलाई 2011 , boston

Two short poems on Death

June23

Aunt Helen by T S Eliot

Miss Helen Slingsby was my maiden aunt,
And lived in a small house near a fashionable square
Cared for by servants to the number of four.
Now when she died there was silence in heaven
And silence at her end of the street.
The shutters were drawn and the undertaker wiped his feet–
He was aware that this sort of thing had occurred before.
The dogs were handsomely provided for,
But shortly afterwards the parrot died too.
The Dresden clock continued ticking on the mantelpiece,
And the footman sat upon the dining-table
Holding the second housemaid on his knees–
Who had always been so careful while her mistress lived.

====

Death of a mechanic – Paul Pellicci

He was fixing his car
Held up only by a jack
While underneath working
It came crashing down
He was using a ratchet wrench
3/8 socket driven into his skull
Wasn’t all that unusual
3/8 is a very common size.
He was buried
By a neglected wife and kids
The emotion was shock
Those tears seemed dry
We all wondered
Who’s getting his tools?

संगीता स्वरुप की कुछ कवितायेँ

June18

संगीता जी दिल्ली में रहती हैं और बिखरे मोती नाम का एक ब्लॉग रखती हैं. http://gatika-sangeeta.blogspot.com/ . सार्थक नाम है इनके ब्लॉग का ! इतनी सुन्दर और कोमल रचनायें पढ़ मन गद-गद हो गया. ये सभी कवितायेँ इनके ब्लॉग से ली गयीं हैं और इनके सर्वाधिकार संगीता जी के पास सुरक्षित हैं. मैं इन्हें केवल non -commercial तरीके से प्रस्तृत कर रहा हूँ…

http://gatika-sangeeta.blogspot.com/2011/03/blog-post_18.html पलाश

पलक पर जमी
शबनम की बूंद को
तर्जनी पर ले कर
जैसे ही तुमने चूमा
मेरी आँखों में
न जाने कितने
पलाश खिल गए ….

http://gatika-sangeeta.blogspot.com/2010/09/blog-post.html

खामोशियाँ
ठहर गयीं हैं
आज
आ कर
मेरे लबों पर

खानाबदोशी की
ज़िंदगी शायद
उन्हें
रास नहीं आई

http://gatika-sangeeta.blogspot.com/2010/07/blog-post_21.हटमल

तमन्ना ने तेरी
होठों पे उंगली
रख कर
जैसे ही कहा

“श्श्शश्श”

सारे मेरे ख्वाब
ठिठक कर
रुक गए…

http://gatika-sangeeta.blogspot.com/2010/03/blog-post_24.हटमल

कल्पना के
इन्द्रधनुष को
किसी क्षितिज की
दरकार नहीं

ये तो
उग आते हैं
मन के
आँगन के
किसी कोने में ….

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वो लम्हे

June9

रुक जाता है New York ,
ठहर जातें हैं चलते कदम,
चुप हो जाती है सभी सडकें,
उन चंद लम्हों के लिए,
जब तुम मेरी किसी बात पर,
शर्माती हो…

8 जून २०११, Boston

New York stops.
footsteps stop,
and the streets turn silent,
for those few moments
When while listening to me,
you blush.

नहीं आयीं तुम

April27

नहीं आयीं तुम,

आज फिर से,
न कुछ लिखा ,
न कुछ बताया.
सब मन में छुपाया.
हे मेरी तुम,
क्यूँ हो ये राज़,
तुम्हारे मेरे बीच,
क्यों हो ये संबंध,
कडवे, संदेह से सींच?
* “हे मेरी तुम” केदार की अनेक रचनाओ का नाम है.

आजीवन – Lifelong – (लाल्टू )

April11

This poem has been taken from http://vatsanurag.blogspot.com/2008/09/blog-post_07.html . It is a very nice blog where you can read poems spanning the whole spectrum of emotions.

This poem, by Laltu, talks about ‘correct’ distances – It is difficult for me to write what it is about. Suffice to say that I was touched.


फिर मिले
फिर किया वादा
फिर मिलेंगे।


बहुत दूर
इतनी दूर से नहीं कह सकते
जो कुछ भी कहना चाहिए

होते करीब तो कहते वह सब
जो नहीं कहना चाहिए

आजीवन ढूंढते रहेंगे
वह दूरी
सही सही जिसमें कही जाएँगी बातें

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ये दिन – केदारनाथ अग्रवाल ( These days by Kedarnath Agrawal)

March22

Kedar often did not name his poems. The first lines were  the name of the poem, something I dont think makes sense. Have thus changed the name of this poem

भूल सकता मैं नहीं

ये कुच-खुले दिन,

ओठ से चूमे गए,

उजले, धुले दिन,

जो तुम्हारे साथ बीते

रस-भरे दिन,

बावरे दिन,

दीप की लौ-से

गरम दिन ।

(My translation follows)

Try yet I cannot forget,

these open breasted days –

kissed by your lips,

these bright, just bathed days.

The ones spent with you,

these sap filled days.

crazy days.

warm, –

warm like the candle flame days.

The subway ride

February7

She surrenders to him, completely,

letting guards down,

( not wanting to let survival skills kick in)

listening to Simon and Garfunkel,

preach about the subway Gods

वेणुगोपाल की 2 रचनायें

January30

ये दोनों कवितायेँ ‘अनुभूति‘ से ली गयी हैं. 

उड़ते हुए

कभी
अपने नवजात पंखों को देखता हूँ
कभी आकाश को
उड़ते हुए
लेकिन ऋणी मैं फिर भी
ज़मीन का हूँ।


जहाँ तब भी था – जब पंख ही न थे
तब भी रहूँगा जब पंख झर जाएँगे।

===

ख़तरे

ख़तरे पारदर्शी होते हैं।
खूबसूरत।
अपने पार भविष्य दिखाते हुए।


जैसे छोटे से गुदाज़ बदन वाली बच्ची
किसी जंगली जानवर का मुखौटा लगाए
धम्म से आ कूदे हमारे आगे
और हम डरें नहीं।
बल्कि देख लें
उसके बचपन के पार
एक जवान खुशी
और गोद में उठा लें उसे।


ऐसे ही कुछ होते हैं ख़तरे।
अगर डरे तो ख़तरे और अगर
नहीं तो भविष्य दिखाते
रंगीन पारदर्शी शीशे के टुकड़े।

Yesterday ( W.S. Merwin)

November25

No comments.

कुंवर नारायण – घर पहुंचना

November19

( As usual, this poem has been taken from Kavitakosh )

Trains entice me. And today, while coming back from wall street I was indeed thinking about how to reach home as quickly as possible.. Probably catch a 2 to 96th Street and then a 1 to 125th Street. The question is : what if journey is staid, and rest is transient? Amazing thought by Kunwar Narayan. Highly Recommended!

हम सब एक सीधी ट्रेन पकड़ कर
अपने अपने घर पहुँचना चाहते

हम सब ट्रेनें बदलने की
झंझटों से बचना चाहते

हम सब चाहते एक चरम यात्रा
और एक परम धाम

हम सोच लेते कि यात्राएँ दुखद हैं
और घर उनसे मुक्ति

सचाई यूँ भी हो सकती है
कि यात्रा एक अवसर हो
और घर एक संभावना

ट्रेनें बदलना
विचार बदलने की तरह हो
और हम सब जब जहाँ जिनके बीच हों
वही हो

Heartless

November17

Do you proclaim me heartless,
incapable
of loving someone?

Like the yellow leaf of Maple Autumn;
A recipient of adulating eyes,
yet an apathetic passer-by?

========

Flirt, who wants to?
when the heart pines to hear
for the songs of soul
to be heard
through your breath
and your kiss
and your
togetherness.

– Varun. Nov 16, New York

Haiku

November9

When I plan to flirt ,
In NY’s Central Park
it never works
I
end up
making Haiku remarks.

उदासी के रंग – कुंवर नारायण

October25

यह कविता यहा से ली गयी है. ( क़विता कोश)
यह कविता, जो बहुत कम शब्दों में बहुत अधिक कह जाती है, हमे बताती है की कुंवर नारायण को साहित्य अकादमी का सम्मान क्यूँ मिला! बेहद खूबसूरत, कमाल है!

====

उदासी भी
एक पक्का रंग है जीवन का

उदासी के भी तमाम रंग होते हैं

जैसे

फ़क्कड़ जोगिया

पतझरी भूरा

फीका मटमैला

आसमानी नीला

वीरान हरा

बर्फ़ीला सफ़ेद

बुझता लाल

बीमार पीला

कभी-कभी धोखा होता

उल्लास के इंद्रधनुषी रंगों से खेलते वक्त

कि कहीं वे

किन्हीं उदासियों से ही

छीने हुए रंग तो नहीं हैं ?

ये शब्द वही हैं – कुंवर नारायण

October18

यह जगह वही है
जहां कभी मैंने जन्म लिया होगा
इस जन्म से पहले

यह मौसम वही है
जिसमें कभी मैंने प्यार किया होगा
इस प्यार से पहले

यह समय वही है
जिसमें मैं बीत चुका हूँ कभी
इस समय से पहले

वहीं कहीं ठहरी रह गयी है एक कविता
जहां हमने वादा किया था कि फिर मिलेंगे

ये शब्द वही हैं
जिनमें कभी मैंने जिया होगा एक अधूरा जीवन
इस जीवन से पहले।

पुनश्‍च (once again)

October18

This poem by Kunwar Narayan has been taken from Kavitakosh. It talks about the ambitions of a man, who probably being bored of his mediocre life, wants to start anew, afresh. Reminds me of my days at I Bank. The poem uses simple language and alludes to a meager paycheck being the be all and end all of one’s worth.

मैं इस्‍तीफा देता हूं
व्‍यापार से
परिवार से
सरकार से

मैं अस्‍वीकार करता हूं
रिआयती दरों पर
आसान किश्‍तों में
अपना भुगतान

मैं सीखना चाहता हूं
फिर से जीना…
बच्‍चों की तरह बढ़ना
घुटनों के बल चलना
अपने पैरों पर खड़े होना

और अंतिम बार
लड़खड़ा कर गिरने से पहले
मैं कामयाब होना चाहता हूं
फिर एक बार
जीने में

विरोधी व्यक्तित्व – केदारनाथ अग्रवाल ( 1964 )

August29

This poem has been taken from the book , “Pank aur patwaar”. This talks about the Dr Jeckyll and Mr Hyde type twin personalities of a person. It is interesting to see how this duality may mean different things. I think Kedar talks about how our socio-economic consciousness restraints us when we try to follow things that make us happy.

खुल गया हूँ मैं ,
धुप में धान के खेत की तरह
हर्ष से हरा-भरा,
भीतर-बाहर लहरा.

मुझे देखता है,
मेरा ही विरोधी व्यक्तित्व,
लालची निगाहों से,
काटकर ले जाने के लिए,
हाट* में बेचकर,
पैसे कमाने के लिए

हाट = weekly village market.

दोस्ती

August28

This was written today after being overwhelmed by Anchaliya’s royal treatment at Houston. He went wayyy out of his way to make me feel comfortable and happy. I am in awe of his behaviour.

वापस आने के बाद ख्याल आया,
क्या दोस्ती हम भी उतनी ही निभा पाएंगे?

ये बात सही है की दोस्ती में कमी नहीं,
पर क्या दोस्ती का जूनून दिखा पाएंगे?

फफक उठे सीने से कशिश बन के चस्म -ए-नम,
सवाल है क्या मौके पे निशाँ आयेंगे ?

समझे, या न समझे, वो हमारा बयान,
हर वक़्त हमे वो अपने साथ खड़ा पाएंगे!

वरुण अग्रवाल, २७ अगस्त २०१०

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इंतज़ार

June8

इंतज़ार में,
चुप हैं कलियाँ,
मुस्कुराएं जो तुम आओ,
आँख से आँख मिलाओ,
एकात्म हो जाओ.

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सध्य्स्रात तुम – दुष्यंत कुमार

June4

I am reading about astronomy these days, what are nakshatras, asterisms etc. Here is a poem by Dushyant Kumar, very much different from his usual style, that talks about eclipse and a women’s beauty. I find these poems, that club human love with Nature’s beauty, to be brilliant.

सध्य्स्रात तुम,
जब आती हो,
मुख कुन्तलों से ढका रहता है,
बहुत बुरे लगते हैं वो क्षण जब,
राहू से काल ग्रसा रहता है* !
( सध्य्स्रात = one who has just bathed ,
.कुन्तल = hair
राहू = an imaginary planet/demon which eats up sun and moon causing solar/lunar eclipses )

पर जब तुम
केश झटक देती हो अनायास
तारों सी बूँदें
बिखर जातीं हैं आसपास
मुक्त हो जाता है चाँद*
तब बहुत भला लगता है!

( अनायास = sudden
* this refers to passing of an eclipse )

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बादल और पौधे

June2

I just read this poem in the train. Monsoon is about to arrive… and
I find these words to be the most innocent expression of related
happiness

This poem has been taken from केदारनाथ अग्रवाल’s book – ” पंख और
पतवार”, published in 1980.

बादल और पौधे

पौधे,
बतियातें है पत्तों से,
बादल से कहते हैं-
आओ जी,
आओ जी,
आओ!

बादल,
धमकाते है बिजली से,
पौदों से कहते हैं-
ठहरो जी,
ठहरो जी,
ठहरो !

पौधे,
घबराते हैं गर्मी से,
बादल से कहते हैं-
बरसो जी,
बरसो जी
बरसो !

बादल,
घहराते है करुना से,
पौदों से कहते हैं-
पानी लो,
पानी लो,
पानी !

पौधे,
लहराते हैं लहरों से,
बादल से कहते हैं-
सागर है,
सागर है,
सागर!

मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ: बशीर बद्र

March31

यह कविता कविता कोष / http://avinashkishoreshahi.wordpress.com/2010/03/30/ से ली गयी है.

मैं तमाम दिन का थका हुआ, तू तमाम शब का जगा हुआ
ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर, तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ

कई अजनबी तेरी राह के मेरे पास से यूँ गुज़र गये
जिन्हें देख कर ये तड़प हुई तेरा नाम लेके पुकार लूँ

प्यासा कुआँ – The thirsty well

March14

लोग कैसे लिख पाते हैं इतने सुन्दर शब्द? मैं हैरान हूँ! कैसे कवि ने “एक बुढाए कुआँ ” कह उसे एक व्यक्तित्व दे दिया है! आह! नमस्तुते कवि, नमस्तुते!

यह कविता http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%86%E0%A4%81_/_%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF से ली गयी है

प्यास बुझाता रहा था जाने कब से
बरसों बरस से
वह कुआँ
लेकिन प्यास उसने तब जानी थी
जब
यकायक बंद हो गया जल-सतह तक
बाल्टियों का उतरना
बाल्टियाँ- जो अपना लाया आकाश डुबो कर
बदले में उतना जल लेती थीं

प्यास बुझाने को प्यासा
प्रतीक्षा करता रहा था कुआँ, महीनों
तब कभी एक
प्लास्टिक की खाली बोतल
आ कर गिरी थी
पानी पी कर अन्यमनस्क फेंकी गई एक प्लास्टिक-बोतल
अब तक हैण्डपम्प की उसे चिढ़ाती आवाज़ भी नहीं सुन पड़ती

एक गहरा-सा कूड़ादान है वह अब
उसकी प्यास सिसकी की तरह सुनी जा सकती है अब भी
अगर तुम दो पल उस औचक बुढ़ाए कुएँ के पास खड़े होओ चुप।

[ Word meanings
यकायक = suddenly
जल-सतह = water surface
अन्यमनस्क = the feeling of finding something useless / absent mindedly
सिसकी = sniffle
औचक = surprised/ sudden ]

नए गगन में – नागार्जुन

March11

गुलरभोज में बाबा के कमरे में एक चित्र टंगा था. उगते हुए लाल सूर्य का चित्रण था. साथ ही एक कविता की ये पंक्तियाँ भी थी –

” नए गगन में,
नया सूरज जो चमक रहा है,
ये विशाल भूखंड,
आज जो दमक रहा है,

मेरी भी आभा है इसमें ! “

A Drinking Song – W B Yeats

February9

My sis asked me to find a poem on wine for her ladies club..and look what a gem I found!

“Wine comes in at the mouth
And love comes in at the eye;
That’s all we shall know for truth
Before we grow old and die.
I lift the glass to my mouth,
I look at you, and I sigh.”

रुबाई – जाँ_निसार_अख़्तर

February7

जब जाते हो कुछ भूल के आ जाते हो
इस बार मेरी शाल ही कर आए गुम

कहतीं हैं कि तुम से तो ये डर लगता है
इक रोज़ कहीं ख़ुद को न खो आओ तुम

http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%80:%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%८८

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बंद दरवाज़े

February1

बंद दरवाज़े,
आज खुले
एक अरसे बाद..

धूमिल हो गयी,
पर रेशमी परी,
की गुलाबी याद..

खुली तो आँखें,
पर क्या ही देखें,
‘साथ’ नहीं है साथ..

पुरानी बातें,
गुजरी रातें,
ख़त्म है उन्माद..

हम तो बोले,
वापस होलें,
काल कोठरी में पार्थ!

After the result

December12

There isn’t much that now you can do

So have a smoke and melt in the night dew

Listen to the tick tock of your pocket clock

Wondering if naught is all, all things come to.

Or probably you can have a beer

And look at your despicable self with a sneer

Mediocre you, always knew,

My efforts were impotent, there or here.

So sip the whiskey, soda and scotch

Sit alone on the backside porch

Lo and Behold! As the truth be told

“You were always useless”, Says the watch.

बांद्रा से दादर

December9

मोड़ते हुए, मुड़ते हुए;

तोड़ते हुए, टूटते हुए;

दनदनाते,

फनफनाते,
सबको हटाते हुए..

हम लोग,

आगे बढ़ते हुए..

This piece was written today morning when I was driving to my office. My first poem in present continuous

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समय और काल

November26
समय और काल
खो जाते हैं Oxford की गलियों में.
High Street में, Broad Street में
Christ Church में
Bodleian और  Magdalen में
और St Mary Cathedral की घंटियों में.
समय और काल
पिघल जाते हैं 800 साल पुरानी
दुकानों में, मीनारों में
और Salvador Dali की घड़ियों में.

— 19 Nov 09, Oxford
Bodleian Library is oneof the oldest Library in the world. Magdalen College was established in 1458 AD and is one of the more beautiful colleges in Oxford.

New Delhi Love song

October25

Sample this beautiful fusion poem from a certain Mr Michael Creighton, who teaches English in a school at Delhi. This poem appeared in the Mint Lounge edition of October 24 2009. This poem was tugged on the bottom right corner of the newspaper and would have most certainly missed my attention, had it not been for the wonderful rhyming pattern that caught my attention. Mr Creighton tries to capture the essence of Urdu Shayari style in English and does an excellent job. I think this is the first poem of its kind that I’ve read.

( For those who are new to Shayari – One of the characteristic things about Urdu couplets ( Shayari ) is that they follow the aa-ba-ba-ba format. While they not necessarily rhyme in the b-b part, the a-a part always matches. )

http://www.livemint.com/2009/10/23225111/New-Delhi-Love-Song.html


Smog and dust mix with the air in New Delhi.

I buy jasmine for her hair in New Delhi.

People come from everywhere to this city;

all are welcomed with a stare in New Delhi.

The finest things in life don’t come without danger.

Eat the street food, if you dare, in New Delhi.

We push in line and fight all day for each rupee.

Can you remember what is fair in New Delhi?

There is nothing you can’t find in our markets.

Socks and dreams sell by the pair in New Delhi.

So many families on the street through the winter;

Sometimes good men forget to care in New Delhi.

My friends ask, Michael, why’d you leave your own country?

I found jasmine for her here, in New Delhi.

संध्या ( The Evening)

September26

Evening happens to be my favourite time of the day. I find Nature to be most beautiful in the golden rays of sunset.

I especially like to roam aimlessly in the streets of kalanagar (bandra east) at about 6 PM.

This poem words what I feel every evening.

सूरज की  किरणे,हर शाम,
अपनी आखरी सासें गिनती हैं,
अपने हरे भरे जग को,
सुन्दर पेड़, सुन्दर सड़क,
और तृप्त वातावरण को,
देखती है विरह दुःख के साथ. 

समाप्त हो जातीं है तब,
मेरी सारी अधूरी इच्छाएं,
और  होता है मुझे,
क्षणिक,
क्षणभन्गुर
सुख का एहसास.
Word Meanings
[तृप्त वातावरण = Satisfied Environment
विरह दुःख = Sadness of leaving dear ones behind
क्षणिक = Momentary (for a second)
क्षणभन्गुर = Ephemeral ]
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सम्बोधन चिन्ह (ज्ञानेन्द्रपति )

September1

( This poem has been taken from http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A4%A8_%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%B9_/_%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF )

There are poems on love. There are poems on Nature. But there are some poems which coalesce both human love and the beauty of nature to produce something that ‘hits’ you. )

सम्बोधन चिन्ह

दिन की फुर्सत के फैलाव-बीच उगे

एक पेड़ के तने से

पीठ टिका कर

जब तुम एक प्रेम-पत्र लिखना शुरू करते हो

कुछ सोचते और मुस्कुराते हुए

तुम्हें अचानक लगता है

कोई तुम्हें पुकार रहा है

कौन है – किधर, इस सूनी दोपहर में

तुम मुड़कर वृथा देखते हो

कि कोई हौले से तुम्हारा कन्धा थपथपाता है

और तुम देखते हो तनिक चौंके-से

पेड़ है, एक पत्ते की अंगुली से छूता तुम्हें–

एक शरारती दोस्ताना टहोका

और तुम उस पेड़ को शामिल होने देते हो अपने सम्बोधन में

सम्बोधन चिन्ह की जगह.

Word meaning

[सम्बोधन चिन्ह = exclamation mark (!)

वृथा = without any reason, useless

हौले =  gently ]

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बालिका वधु – title song lyrics

August6

हे ऐ ऐ ऐ..

छोटी सी उमर,

परनै रे बाबोसा,

करो थारो कांई रे,

कसूर.

हो…

इतना दिनों तो म्हाने

लाड लगाया

अब क्यों करो म्हाने,

हिवडे से दूर?

P.S. Just came to know that this song is actually a small variation of a song in Bandit Queen, a movie by Shekhar Kapoor (1995).

ट्राम में एक याद – ज्ञानेन्द्रपति

July26

http://anahadnaad.wordpress.com/2008/08/14/gyanendrapati-poem-tram-mein-ek-yaad/

ये कविता इस link से ली गयी है. वैसे तो मुझे ये यहाँ लिखनी नहीं चाहिए, किन्तु इतने सुन्दर शब्द से मैं मंत्रमुग्ध हो गया हूँ ! ज्ञानेन्द्रपति की इस कविता को पढना बहुत ज़रूरी है किसी भी काव्य प्रेमी के लिए…

ट्राम में एक याद

चेतना पारीक कैसी हो ?
पहले जैसी हो ?
कुछ-कुछ खुश
कुछ-कुछ उदास
कभी देखती तारे
कभी देखती घास
चेतना पारीक, कैसी दिखती हो ?
अब भी कविता लिखती हो ?
तुम्हें मेरी याद न होगी
लेकिन मुझे तुम नहीं भूली हो
चलती ट्राम में फिर आँखों के आगे झूली हो
तुम्हारी कद-काठी की एक
नन्ही-सी, नेक
सामने आ खड़ी है
तुम्हारी याद उमड़ी है
चेतना पारीक, कैसी हो ?
पहले जैसी हो ?
आँखों में अब भी उतरती है किताब की आग ?
नाटक में अब भी लेती हो भाग ?
छूटे नहीं हैं लाइब्रेरी के चक्कर ?
मुझ-से घुमंतू कवि से होती है टक्कर ?
अब भी गाती हो गीत, बनाती हो चित्र ?
अब भी तुम्हारे हैं बहुत-बहुत मित्र ?
अब भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो ?
अब भी जिससे करती हो प्रेम उसे दाढ़ी रखाती हो ?
चेतना पारीक, अब भी तुम नन्हीं सी गेंद-सी उल्लास से भरी हो ?
उतनी ही हरी हो ?

उतना ही शोर है इस शहर में वैसा ही ट्रैफिक जाम है
भीड़-भाड़ धक्का-मुक्का ठेल-पेल ताम-झाम है
ट्यूब-रेल बन रही चल रही ट्राम है
विकल है कलकत्ता दौड़ता अनवरत अविराम है
इस महावन में फिर भी एक गौरैया की जगह खाली है
एक छोटी चिड़िया से एक नन्ही पत्ती से सूनी डाली है
महानगर के महाट्टहास में एक हँसी कम है
विराट धक-धक में एक धड़कन कम है कोरस में एक कंठ कम है
तुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते हैं उतनी जगह खाली है
वहाँ उगी है घास वहाँ चुई है ओस वहाँ किसी ने निगाह तक नहीं डाली है
फिर आया हूँ इस नगर में चश्मा पोंछ-पोंछ कर देखता हूँ
आदमियों को   किताबों को   निरखता लेखता हूँ
रंग-बिरंगी बस-ट्राम     रंग-बिरंगे लोग
रोग-शोक   हँसी-खुशी   योग और वियोग
देखता हूँ अबके शहर में भीड़ दूनी है
देखता हूँ तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है
चेतना पारीक, कहाँ हो कैसी हो ?
बोलो, बोलो, पहले जैसी हो ?

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पार्थ

July25

[Prologue : This poem was written when my brother sent me the first pic of my newborn nephew. It was an impromptu attempt to word how i felt ]

 

पार्थ धरा पर फिर आया है,

सम्मोहित हो सुन्दरता से,

कृष्ण दे रहे प्रवचन फिर फिर,

गीता जीवन सार्थकता के!

और पार्थ सुप्त देखता है,

दिव:स्वप्न मातृ-पितृ ममता के,

आश्चर्यचकित , मैं स्तब्ध,

दृश्य जानता संतति के!

[ Word Meanings
धरा = Earth
सम्मोहित = Hypnotised
सार्थकता = Apposite
सुप्त = in sleep
दिव:स्वप्न = beautiful dreams
मातृ-पितृ = mom dad
स्तब्ध = amazed
संतति =  ( Child)
दृश्य जानता संतति के!  = I refer to the miracle of one life creating another life ( Lit. ” Watch picture of the child”)
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मानसून की एक रात

July17

This poem was written on a particularly stormy night.  Its a personification of  rain, thunder and lightening.

रात कल रात
रात भर रोती रही,
सिसक सिसक कर,
उमड़ उमड़ कर,

कोडे की मार से,
तड़प तड़प कर

word meanings

[ सिसक = sniffing

उमड़ = cry in outbursts

कोडे = whip ( lightening) ]

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विवाह

July14

तुम और मैं
सशंकित प्रतिनिधियों के चुने,
असीमित संभावनाओं
की कसौटी पर खरे,
लेकिन एक दुसरे से
डरे डरे.
भय से अधमरे.

 

[ सशंकित – unsure

प्रतिनिधियों – representative

असीमित संभावनाओं = infinite possibilities

कसौटी = stone with which a goldsmith ascertains the purity of gold

खरे = passed ]

कल और आज.

May6

 समय के दर्पण में खुद को तकता,
‘कल’ है वक्ता ; ‘आज’ है श्रोता,
निकल तरकश से प्रश्नोत्तर के शूल ,
‘आज’ है मेरा जर – जर होता .

पुरातन विचार हुंकार भरते,
नूतन कर्म के कारण परखते,
और व्यथित हो यथार्थ से फिर,
परिवर्तित दीवारों पे सर पटकते
[ वक्ता –  speaker
श्रोता – listener
तरकश – Arrow Case
प्रश्नोत्तर – Question and answer
जर – dilapidated, old, weak
पुरातन – old
हुँकार – war cry
नूतन – new
व्यथित – traumatised
यथार्थ – reality
परिवर्तित – that which has changed/transformed ]

Daily Nightly – The Monkees

May3

By sheer chance I noticed what Sahil D Hakim’s status message on Gtalk was. Here was a obscure song called Daily Nightly that he was listening to. I searched the net, and man! It’s Nice. The lyrics are awesome. Psychedelic Rock is not my type of music but this is different.  Listen to it, or just read the words that follow…

( The monkees was a 1960’s band which was ‘pre-fabricated’ to star in a TV series by the same name. Words by Michael Nesmith)

“Darkened rolling figures move through prisms of no colour
hand in hand, they walk the night,
but never know each other.
Passiond’  pastel neon lightslight up the jeweled traveler

who lost in scenes of smoke filled dreams,
Find questions, but no answers.


Startled eyes that sometimes see phantasmagoric splendor
pirouette down palsied paths
wiith pennies for the vendor.
salvations yours for just the time it takes to pay the dancer.

and once again such anxious men
Find questions, but no answers

…. “

क्षत विक्षत

April5

कॉफी की एक चुस्की लेते हुए
वो देखे मुझे,

उसके चेहरे पे एक लट

मैं खो जाऊं कहीं
मेरा हृदय क्षत विक्षत…

( क्षत विक्षत – टुटा हुआ, चकनाचूर जैसे की कांच की टूटी बोतल

चुस्की – sip  )

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हम आगे निकल आयें है.

March21

बहुत सारे लोग पीछे छूट गए हैं,
बहुत सारे रिश्ते टूट गयें हैं,
बहुत सारी यादें,
भूली बिसरी हो गयी हैं,
यादें धुंधली हो गयीं हैं.
मोतिआबिंद आँखें,
स्वप्रतिबिम्ब झाँकें
हम आगे निकल आयें है.

ख्याल बदल गयें है,
सवाल बदल गए हैं,
ख़ास लोग अब इतने याद नहीं आते,
ख़ास अब उनमे, हम कुछ नहीं पाते,
अगर हों भी वो अलग,
तो समय किसके पास है जनाब?
अगर बोरीवली लोकल छूट गयी.
तो जानते हो,
होगा कितना समय खराब?
हम आगे निकल आयें है.

वो बातें अब हो गयी हैं पुरानी,
इतनी पुरानी,
की ‘एक समय की बात है’
ऐसे कह सके हम कहानी
लोगों के नाम अब याद नहीं,
उनके बारे में पता करने का,
अब उतना उन्माद नहीं.
पुरातन लगता नहीं आकर्षक
दिल करता नहीं उनके नाम पे धक् धक्
हम आगे निकल आये हैं.

पुरानी यादें हमेशा रहती अधूरी हैं,
अब बाकी बातें जानना ज्यादा जरूरी है,
मसलन बांद्रा और पार्ला में,
कितने स्टेशन की दूरी है?
और सुंदरी के मूर्ख विचारों पर,
बेसरपैर की बातचीत पे,
कब करनी जी हजूरी है?
क्यूंकि भूत गया है पीछे छूट,
और मैं हुआ हूँ स्मार्ट
पहने सूट बूट
दुनिया करता लूट.
हम आगे निकल आयें है.

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क्षोभ

March11

अतृप्त मैं,
सुदीप्त तुम.
‘औ हमारे मध्य,
अकथ्य खालीपन..

 

( क्षोभ = sadness with a tinge of anger

अतृप्त = unsatisfied

सुदीप्त =  beautiful, bright 

अकथ्य = What couldn’t be said)

अष्टपदी – लिफ्ट

February25

टन्न्न्न!

कभी धरातल
कभी आकाश,
कभी अँधेरा
कभी प्रकाश..

ऊपर नीचे,
नीचे ऊपर
लिफ्ट के बीच खडा मैं,
और मेरे विचारों के बवंडर ..

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मटमैले नैन

February17

उसके मटमैले नैन ,
मेरे मर्म को
पिघला देते हैं..

और मैं,
मैं पानी बन जाता हूँ.

टप टप..
टप टप..

अपनी आंखों से बह जाता हूँ.

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एहसास

February16

कांक्रीट के जंगल में,
टूटी पत्ती का
मादक नृत्य देख,
हुआ मुझे भी एहसास.
जिंदा हूँ मैं,
चलती है मेरी भी साँस.

हे मेरी तुम!

February15

केदारनाथ अग्रवाल की कवितायेँ मुझपे जादू कर देती हैं। वे इतनी सुंदर होती हैं, की मन झंकृत हो उठता है। मसलन यह नमूना देखिये। कवि इसे अपनी octogenarian पत्नी के लिए लिखता है, और कितने कम शब्दों ( 27 शब्द मात्र!) में ही कितना कुछ कह जाता है॥

(http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=हे_मेरी_तुम_!.._/_केदारनाथ_अग्रवाल)

हे मेरी तुम !
बिना तुम्हारे–
जलता तो है
दीपक मेरा
लेकिन ऎसे
जैसे आँसू
की यमुना पर
छोटा-सा
खद्योत
टिमकता,
क्षण में जलता
क्षण में बुझता ।

( खद्योत = एक छोटी सी नाव जिसपे एक दीपक रखकर नदी में बहाया जाता है, हरिद्वार में प्रचलित)

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क्या करें, कहाँ जाएँ.

January4

क्या करें और कहाँ जाएँ?

क्या रात को सवेरे में तब्दील होते हुए,
पूर्वोत्तर कि ओर तकते जाएँ?

क्या जेहन में छुपे हुए गम को,
मुस्कुराहटों के झूठ में डुबोते जाएँ?

दुपहर मिल कर भी उनसे,
शाम को अनजाने होते जाएँ?

रिश्ता अजीब है ये ‘स्वतंत्र’,
चाहे नाम हज़ार देते जाएँ…

वो

April13

(This poem was written in January 2008 while I was walking on the road outside the US Embassy in New Delhi.)

दुनिया मैं हैं अनेक सुंदर चेहरे,

ये बात है मुझे अच्छी तरह पता।

ऐसा नही कि वो सबसे अलग,

ये चीज़ भी अच्छी तरह मैं जानता ।

लेकिन दिल्ली की किसी सड़क पर,

जब एक हवा का झोंका,

उसके बालों को बिखरा देता है,

उसके साथ बैठे हुए-

जाने क्यों,

मन में एक टीस उभर आती है ।

जाने क्यों,

साँस एक पल ही सही,थम सी जाती है

मैं आँखें कहीं और मोड़ लेता हूँ,

जाने क्या सोचने लगता हूँ ……

Word Meaning

{ टीस = nostalgic pain

झोंका = gust of wind }

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तेरे बिना वो बात नही…

February25

सीताराम भारतीय की खाली कुर्सी,
उदास आधा चेहरा झुकाए,
करती रहती है किसका इंतज़ार?

इंडिया गेट पे इठलाती हुई शाहजहाँ रोड,
किसी के आने की राह देखते हुए,
है किस कि हँसी सुनने को बेकरार ?

ये कुतुब कि सड़कें,
सुंदर काले रंग का दुपट्टा ओढे,
क्यू हैं किसी का चेहरा देखने को तैयार?

सारे गाने वोही तो हैं,
सारे पकवान यही तो हैं,
देखो सब कुछ तो है वही ,
हर चीज़ अपने स्थान पर खड़ी सही,
पर जाने क्यों लगता है तेरे बिना,
तेरे बिना वो बात नही…..

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डर

February18

सर्द हवा से टूटते पत्ते
किसी से डर , पीले पड़कर
चुप हो जाते हैं।

किसी कोने में छुप कर,
राहगीरों की पदचाप से बचते हुए,
मौन व्रत में डूब जाते हैं।

और इसी डर से की कोई देख न ले,
अकेलेपन से झूझते हुए,
चिरनिंद्रा में लीन हो जाते हैं।



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ये रिश्ता क्या कहलाता है?

February11

तस्वीरे बनाता रहता हूँ मैं टूटी हुई आवाजों पर,
एक चेहरा ढूँढता रहता हूँ मैं दीवारों और दरवाजों पर,
मैं अपने पास नही रहता और दूर से कोई बुलाता है,
ये रिश्ता क्या कहलाता है?
ये रिश्ता क्या कहलाता है?
ये रिश्ता क्या कहलाता है?
ये रिश्ता क्या कहलाता है?

~~~ राहत इन्दौरी,” मिनाक्षी “

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पत्ते कुछ कहते हैं ..

January4

जनवरी की गुनगुनी धुप में ,
ये धीमे अठखेलियाँ भरते हैं
मंद मंद मुस्कराते हुए
ये पत्ते कुछ तो कहते हैं…

ये क्या पंछी से पूछ्तें हैं
“तुम किस देश से आए हो?”
या फिर गिलहरी के फुदकने की बातें ,
पुर्वायी को बतातें हैं
ये पत्ते कुछ तो कहते हैं…

क्या बीता हुआ साल सोच के,
ये यादों में खो जातें हैं ?
या क्या ये तुम्हारी आंखें देखकर ,
एक अधूरा सा गीत गाते हैं ..
ये पत्ते कुछ तो कहते हैं…

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My first Post

November22

Decadence is setting in. My ideas & ethics are dying and am everyday getting more and more materialistic.

A number of thoghts cross my mind everyday. This is an attempt to word my emotions on a gamut of things.

If you’re here to find some fun stuff, you’ll be dissapointed. This is meant to be more of a chronicle rather than an intellectual/entertainment portal!

However, if you’re here to see what have i been up to; you’re more than welcome.

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