क्या अच्छा है, क्या बुरा? आजीवन सोचता रहूँ तब भी किसी नतीजे पे नहीं आ सकता. जैसे की मेरे घर के बाहर लगा maple का पेड़. जब कोई interview call आती है और मेरे पैरों में उछाल होता है, तब वो कितना प्यारा दीखता है. जब कोई मुझे नकारता है और मैं ज़मीन में गढ़ा जाता हूँ, तब वो कैसा मरणासन्न लगता है. पेड़ तो पेड़ है. autumn तो autumn ही है. columbia university तो columbia university ही है. मैं भी वोही का वोही हूँ.
नज़रों में जरूर फर्क है…
पहली एक फिल्म है, दुसरे एक बेहतरीन कलाकार थे जबकि तीसरा एक गाना है. सभी में एक बात सामान्य है, और वो ये की तीनो ही protagonist की नज़र से किसी चीज़ को देखते हैं न की वास्तविकता से. कला की यही बात तो उसे मनुष्य की एक बेहतरीन कृति बनती है! Mulholland Drive में सपने और हकीक़त आपस में चीनी और पानी की तरह घुल मिल जाते हैं, इतना ज्यादा की दोनों में भेद करना असंभव हो जाता है. यहाँ में पाठकों को Mulholland Drive ( Connie Stevens) के Sixteen reasons why I love you गाने की याद दिलाना चाहूँगा. Naomi Watts को लगता है की director उसी को देख रहा है, जबकि वो तो Laura Harring से इश्क फर्मा रहा होता है. पूरा दृश्य Naomi के दृष्टिकोण से फिल्माया गया है!

Mulholland Drive - Sixteen reasons
अब Van Gogh को लीजिये. Starry Night नाम की एक बेहद उम्दा चित्र में रात उमड़ती हुई प्रतीत होती है. तारे घुमते हैं, हवा हिल्गोचे खाती है , चाँद सूर्य से भी ज्यादा दीप्त है… सब कुछ चित्रकार के मन मैं है! लेकिन देखिये वो एक तारे की रात को कैसा अलोकिक बना देता है! मैंने लन्दन में जब इनकी बनाई दृश्यों को देखा तो ठगा सा रह गया !
आखिर में इश्क्यियाँ का गाना ” दिल तो बच्चा है जी”. निर्देशक ने पूरा गाना ऐसे फ़रमाया है की वो खालुजान ( नसीरुद्दीन ) की भावनाओ को दिखता है.. शायद विद्या बालन ने कोई मामूली सी बात नसीर को कही होगी, लेकिन नसीर के किरदार ने उसके अनेक मतलब निकाले.. नसीर का किरदार ‘कृष्णा’ को प्यार करता है और उसे लगता है की कृष्णा भी करती है.. “the heart easily believes what it wants to believe or what it is afraid to believe” .. ज़रा शब्दों पे गौर फरमाईये ..
“किसको पता था ,पहलु में रखा,
दिल ऐसा बाज़ी भी होगा.
हम तो हमेशा, समझते थे कोई ,
हम जैसा हाजी ही होगा
हाए जोर करे, कितना शोर करे
… बेवजह बातों पे ऐंवे गौर करे…
दिल सा कोई कमीना नहीं”
— गुलज़ार
रात के १ बजे मैं फ़िल्म review लिख रहा हूँ, ये इस बात का प्रमाण है की मैं अभी तक देव डी के नशे से बहार नही आ पाया हूँ,. देखिये साहब सीधी सीधी बात है. या तो आपको ये फ़िल्म बेहद पसंद आयेगी, या आपको ये एक इमोशनल अत्याचार के सिवा और कुछ न लगेगा. मैं पहली श्रेणी में अपने को पाता हूँ. लोग कह सकते हैं की ये एक व्यभिचारी फ़िल्म है और उन्हें इसमे सस्ते व्यंग्य की बू आ सकती है, या मेरी नज़रिए से देखें तो अपने को बर्बाद करने का जूनून सर चढ़ कर बोलता है. पागलपन है एक जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है. मुझे क्या पसंद आया? पता नही , सच में पता नही. अगर मैं आपसे पूछूँ की भई बिरयानी में चावल अच्छा था, या नमक अच्छा था, या कर्री अच्छी थी, तो आप क्या कहेंगे? पता नही न? ठीक वैसे ही मुझे नही पता की साला इस फ़िल्म में ऐसा क्या था जो मुझे किसी हथौडे की तरह ‘hit’ कर गया. शायद चंडीगढ़ में रहने की वजह से और दिल्ली के दरियागंज की सड़क का दृश्य या फिर कैमरे के विभिन्न कोण, या फिर संगीत, या कोकीन के शॉट्स, या सिगरेट का dhuaN …उम्म्म पता नही. साला शाहरुख़ की देवदास देख में सोचता ही रह गया की B.C., किसी को इस फ़िल्म में ऐसा क्या लगा की ९ और बन गयीं इस उपन्यास के ऊपर. और देव डी को देख मैंने सोचा, अनुराग कश्यप, केवल तुम इस बर्बादी को समझ पाए हो. पागलपन है साहब, बस पागलपन.
मैने एक बहुत अच्छी मूवी देखी – “black & white ”. मुझे बहुत आश्चर्य हुआ यह देख के कि सुभाश घई भी ऐसी फ़िल्मे बना सकता है जो कि कला और वाणिज्यिक पिकचरों का खूबसूरत संगम हों। काफ़ी समय बाद एक ऐसी मूवी आई है जो कि देशप्रेम को एक घटिया नारे से आगे ले जाकर मानवीय मूल्यों से जोड कर देखती है।
मुझे लगता है कि वास्तविक देशप्रेम ये नही है कि हम अपनी नाक ऊँची रखें और अपने पूर्वजों के गौरवशाली अतीत पर गुरुर करते फिरें। ऐसा नही कि मुझे उनपे गर्व ना हो, लेकिन मेरी जमात – मेरी पीढी ने देश को क्या दिया, यह महत्व रखता है। और शोचनीय बात यह है कि आज ज्यादातर चीज़े जिन पर भारत का सम्मान किया जाता है, वो हमारे पूर्वज़ो की देन है, ना कि वर्तमान बाशिंदों की।
खैर, जैसा कि मै कह रहा था, black & white की कशिश यह है कि वो निहायती भावुक संवेदनाओ को देशप्रेम से जोडती है। पुरानी दिल्ली के अनगिनत रास्तों, जामा मसजिद की मीनारतें, कुतुब मीनार के बगीचे, बच्चों का कोलाहल, पारिवारिक जीवन के अंतरंग दृश्य, और मानवीय संबंधों को कैसे सहजता से देश से एवं समाज से जोडा गया है – यह काबिलेतारीफ़ है।
बस अब कोई ये बात सन्नी देओल को समझा दे कि बेवकूफ़ी भरे संवाद और पाकिस्तानीयो की काल्पनिक पिटाई से जनता भले ही खुश हो जाती हो, उस्से चाहे फ़िल्म कितना ही पैसा कमा ले – किन्तु वह नाटक सच्चे देशप्रेम से कोसों दूर है।
Decadence is setting in. My ideas & ethics are dying and am everyday getting more and more materialistic.
A number of thoghts cross my mind everyday. This is an attempt to word my emotions on a gamut of things.
If you’re here to find some fun stuff, you’ll be dissapointed. This is meant to be more of a chronicle rather than an intellectual/entertainment portal!
However, if you’re here to see what have i been up to; you’re more than welcome.
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