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A beautiful poem on ending relationships/ divorce by Govind mathur. This has been taken from Kavitakosh. This poem and the collection) got the poet Rajasthan Sahitya Academy award in 1986.

A simple poem, but very deep. Mr Mathur blogs at http://www.govind-mathur.blogspot.com/

इस तरीके से नही
पहले हमें
सहज होना होगा
किसी तनाव में
टूटने से बेहतर है
धीरे-धीरे
अज्ञात दिशाओं में
गुम हो जाएँ

हमारे सम्बन्ध
कच्ची बर्फ से नही
कि हथेलियों में
उठाते ही पिघल जाएँ
आख़िर हमने
एक-दूसरे की
गर्माहट महसूस की है

इतने दिनों तक
तुमने और मैंने
चौराहे पर खड़े हो कर
अपने अस्तित्व को
बनाए रखा है
ये ठीक है कि
हमें गुम भी
इस ही
चौराहे से होना है

पर इस तरीके से नही
पहले हमें
मासूम होना होगा
उतना ही मासूम
जितना हम
एक दूसरे से
मिलने के पूर्व थे

पहले मैं या तुम
कोई भी
एक आरोप लगाएंगे
न समझ पाने का
तुम्हें या मुझे
और फिर
महसूस करेगें
उपेक्षा
अपनी-अपनी

कितना आसान होगा
हमारा अलग हो जाना
जब हम
किसी उदास शाम को
चौराहे पर मौन खड़े होंगे

और फिर जब
तुम्हारे और मेरे बीच
संवाद टूट जएगा
कभी तुम चौराहे पर
अकेले खड़े होगें
और कभी मैं

फिर धीरे-धीरे
हमें एक दूसरे की
प्रतीक्षा नही होगी
कितना सहज होगा
हमारा अजनबी हो जाना
जब हम सड़कों और गलियों में
एक दूसरे को देख कर
मुस्करा भर देंगे
या हमारा हाथ
एक औपचारिकता में
उठ जाया करेगा

हाँ हमें
इतनी जल्दी भी क्या है
ये सब
सहज ही हो जाएगा
फिर हमें
बीती बातों के नाम पर
यदि याद रहेगा तो
सिर्फ़
एक-दूसरे का नाम

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Category: Emotion, Uncategorized, love, marriage, present  Tags: ,  Enter your password to view comments

तुम और मैं
सशंकित प्रतिनिधियों के चुने,
असीमित संभावनाओं
की कसौटी पर खरे,
लेकिन एक दुसरे से
डरे डरे.
भय से अधमरे.

 

[ सशंकित - unsure

प्रतिनिधियों - representative

असीमित संभावनाओं = infinite possibilities

कसौटी = stone with which a goldsmith ascertains the purity of gold

खरे = passed ]

” तुम ideal husband material हो.”, मुझसे उसने matter-of-factly तरीके से कहा.

मेरा केक मुह में ज्यों का त्यों रह गया

“क्या मतलब है तुम्हारा?” अपना केक चबाते हुए मैंने पूछा.

” मतलब की .. जैसे कुछ लोग होते हैं जो boyfriend material होते हैं, उनके साथ मज़ा तो काफ़ी आता है लेकिन घर पे… मिलाया नही जा सकता , समझ रहे हो न तुम? ” उसने बेबाक विचार व्यक्त किए.

मैं , जो केक खाने में अभी तक व्यस्त था , इस बात के बारे में सोचने लगा. यहाँ मैं बताना चाहूँगा की मैंने कभी अपने बारे में इस नज़रिए से नही सोचा. मैं कैंटीन में हमेशा केक में ज्यादा दिमाग लगता हूँ और अपनी छवि पे कम. मुझे लगता है की यह चीज़ मुझे भ्रम से बचाती है , ये अलग बात है की रोज़ रोज़ केक मेरे वजन को रहस्यमई तरीके से बढ़ा रहा है.

” इसे मैं comment समझूँ की compliment?” , मैंने पूरी सच्चाई से पूछा.

“obviously, compliment था ” , उसने कहा

उसकी आंखों में और उसकी बातों के मतभेद को अगर मैं अनदेखा कर दूँ, तो कहूँगा की मुझे अच्छा लगा.