Oh me!

We are so small between the stars & so large against the sky. and lost in subway croud, I try to catch your eye …..

Uncatena

May4

“All I want from you is a letter
And to be your distant lover
That is all that I can offer at this time”
– ( Sylvan esso, ‘Uncatena’, 2004 )

I must admit my ignorance about the exact meaning of this song, or the name ‘uncatena’ for that matter.

Video https://www.youtube.com/watch?v=6yrGw0sRv3Q .. these lines appear at 3:15

स्मृति

February7

भागता गया मैं
रात और दिन
उत्तर दक्षिण , पूरब पश्चिम

हिंदुस्तान से अमरीका
अमरीका से कंबोडिया
कैम्ब्रिज से नेटिक
और फिर नेटिक से कैम्ब्रिज
रटगर्स से हार्वर्ड
रेड लाइन से ग्रीन लाइन
एटलांटिक से प्रशांत
दिन प्रतिदिन
मौसम से मौसम
साल प्रति साल

मैंने मदद मांगी
फूलों से और पेड़ों से
नदियों से, पहाड़ियों से
मेपल से ओक से
कल्पतरु से
सूरज की किरणों से
ब्रह्माण्ड क नक्षत्रों से

कोई न बचा पाया
कोई न छुपा पाया
तुम्हारी स्मृति से

तुम्हारी यादें
काल और समय की
सीमाओं को नहीं पहचानती
वे स्वयं
ईश्वर से हार नहीं मानतीं

 

( Cambridge, 7 Feb 2016 )

Stayin’ alive

December10

Was it the wind tossing your brown hair

like a kite desperate to fly,

or was it you saying your usual things,

“what’s wrong with you!”

with your mischivious eyes?

I cant decide, it a tie

what makes me happy to be stayin’ alive.

( Boston : December 10, 2015)

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हफ्ते भर

December2

हफ्ते भर तुम्हारी याद आती रही
हफ्ते भर नींद से मुझे जगाती रही
कितनी कोशिश की , भाग जाऊं कहीं बहुत दूर
लेकिन फांसी के फंदे जैसी
मेरा रुँधा गला दबाती रही.

( Boston, 3 Dec 15 )

वो हमसफ़र था

October23

Qurat-u-lain Baluch has rendered a beautiful version of this song by Abida Parween for coke studio. The original nazm was meant to capture the emotions fet by the divided east Pakistan – west Pakistan population, after the 1971 war which saw the creation of Bangladesh. It has been penned down by Naseer Turabi

These days, it has been synonymous with the memories that remain after a divorce.

My translation of certain words is in english…

 

वो हमसफ़र था मगर उस से हमनवाई न थी
के धूप छाँव का आलम रहा, जुदाई न थी

humsafar: fellow traveller ( used  for spouse )

humnavai: the feeling of being together,

अदावतें थीं, तग़ाफ़ुल था, रंजिशें थीं मगर
बिछड़ने वाले में सब कुछ था, बेवफ़ाई न थी

adawatein : anger

tagaful: inconsiderateness

rangish: anguish

bewafai : infidelity

न अपना रंज, न अपना दुख, न औरों का मलाल
शब-ए-फ़िराक़ कभी हम ने यूँ गँवाई न थी

shab-e-firaq : the night of separation

बिछड़ते वक़्त, उन आँखों में थी हमारी ग़ज़ल
ग़ज़ल भी वो जो किसी को अभी सुनाई न थी

मुहब्बतों का सफ़र कुछ इस तरह भी गुज़रा था
शिकस्ता-दिल थे मुसाफ़िर, शिकस्ता-पाई न थी

Shikasta dil : defeat of heart

shikasta pai : defeat of feet ( to give up walking )

( Naseer Turai, 1971 (?) )

 

 

Kettering

October7

This song is stuck in my mind, and refuses to go unless I pen down the lyrics:

 

I wish that I had known
in that first minute we met
the unpayable debt
that I owed you

Because you’d been abused
by the bone that refused you
and you hired me
to make up for that

You said you hated my tone
it made you feel so alone
so you told me
I ought to be leaving

You made me sleep all uneven
and I didn’t believe them
when they told me that there
was no saving you…

( The Antlers, 2009 )

 

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मैं नहीं समझ पाता

June28

ये कोई आवश्यक तो नहीं
की हर बार जब तुम मुझसे मिलो
तुम कुछ ऐसा करो
की मेरा विवादित मन निरुत्तर हो जाए

क्यों तुम हो जाती हो भावुक
करुणा से भर
जब मैं होता हूँ दुखी

भला क्यों तुम मुझसे
करती हो इतना प्रेम
मुझे नहीं समझ आता
असमंजस में ये दिन बीता जाता

 

( Yale University, New Haven : 6/27/2015 )

कोई जरूरत नहीं थी

March22

कोई जरूरत नहीं थी
दो सौ मील दूर आकर
मेरी मदद करने की.

न ही ज़रूरी था
मुझे कहना
सब ठीक हो जायेगा

न मेरे बालों को
सहलाने की जरूरत थी
और ना ही मुझे
वैसे देखना चाहिए था.

Sangria में थोड़ी चीनी
के बिना भी काम चल जाता
और महफ़िल में लोग
थोड़ा सा कम खाना
खा सकते थे।

बसंत के पहले दिन
तुम्हे नहीं होना चाहिए था मेरे साथ
सूरज की मुलायम धूप
तुम्हे भूलने नहीं देती है.
अब पूरा साल कम पड़ेगा
तुम्हारी शुक्रगुजारी के लिए
तुम्हे कुछ और प्यार करने के लिए…

( Natick, 03/22/15 )

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Protected: The suitcase

February21

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Protected: अब तुम रूठो / गोपालदास नीरज

November21

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प्यार के तरीके

November13

♂ ” मैंने तो तुम्हे इतना प्यार किया,,, और आज भी करता हूँ, मुझे अभी भी समझ नहीं आता की तुम्हे इतना प्यार करने के बावजूद हम यहाँ कैसे पहुँच गये.  :'( ”
♀ “ हमारे प्यार करने के तरीके अलग हैं ”

Boston, 11/12/2014

=====

सुनता हूँ की प्यार करने का एक तरीका होता है

ऐसे  नहीं, की दूसरा pressure में आ जाए

प्यार को तर्कसंगत होना चाहिए,

सधा होना चाहिए।

 

ये नहीं की ले लो उसे आगोश में कभी भी

पार्क में बैठे हुए थोड़ी तमीज़ से पेश आना चाहिए

ये नहीं की खाना बनाते हुए परेशान करते रहो   ,

इश्क करने का सही समय होना चाहिए

 

वो तुम्हे हर वक़्त ILU नहीं कह सकती

और न चाहती है की तुम हमेशा कहो ऐसा उसे

हर वक़्त excited  रहने की कोई जरूरत नहीं है,

आखिर हम कोई 15 साल के बच्चे नहीं हैं

 

हम 30  साल के हैं  – परिपक्व और शांत

जैसे मेरे घर के सामने बहती चार्ल्स नदी

जैसे बालकनी में रखी दो कुर्सियां

जैसे सर्दी के मौसम में हिमाद्रित पेड़

जैसे कमरे में चुपचाप पड़ी दराज़

 

ये चाय पीने जैसा है

गर्म पानी में भीगने दो Teabag को,

और उसमे फिर डालो आधा चम्मच चीनी

और थोडा सा half-and-half

कोई अजमेर  रेलवे स्टेशन  नहीं

की एक ही पतीले की गन्दी चाय

दिन भर गर्म करते रहो

 

बेवक़ूफ़ दिल

लाख समझा लो उसे सुसंस्कृत Starbucks  के फायेदे

उसे अजमेर रेलवे स्टेशन की चाय ही पसंद आती है।

 

Boston , 6 सितम्बर 2013

 

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आज उसे फिर याद किया /

November6

आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया
बंद गली के आख़िरी घर को खोल के फिर आबाद किया

खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों से
रंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया

बड़े बड़े ग़म खड़े हुए थे रस्ता रोके राहों में
छोटी छोटी ख़ुशियों से ही हम ने दिल को शाद किया

बात बहुत मामूली सी थी उलझ गई तकरारों में
एक ज़रा सी ज़िद ने आख़िर दोनों को बर्बाद किया

दानाओं की बात न मानी काम आई नादानी ही
सुना हवा को पढ़ा नदी को मौसम को उस्ताद किया

( निदा फ़ाज़ली, 1970s ?)

Taken from Kavitakosh.

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सूर्यास्त

October25

समुन्दर किनारे
शुरू करता हूँ
मैं सूर्यास्त देखना

लहर आती जाती हैं
विचार आते जाते हैं
लोग आते जाते हैं
लेकिन मैं ठहर जाता हूँ

आश्चर्यचकित, मैं पाता हूँ,
पैरों को रेत में आधा गढ़ा
अतीत और भविष्य के बीच
आधा ज़िंदा, आधा मरा

( Boston, 10/24/2014 )

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English अष्टपदी

June6

Wild winter, warm coffee
Mom’s gone, do you love me?
Blazing summer, cold coffee
Baby’s gone, do you love me?

 

– Sylvan Esso, Coffee

Video : https://www.youtube.com/watch?v=Qr5AIKRPIHo&feature=kp

Spotify :   Sylvan Esso – Coffee

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आभार – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

May20

this poem has been taken from here.

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं,
सीमित पग डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं।
दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रसाद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

साँसों पर अवलम्बित काया, जब चलते-चलते चूर हुई,
दो स्नेह-शब्द मिल गये, मिली नव स्फूर्ति, थकावट दूर हुई।
पथ के पहचाने छूट गये, पर साथ-साथ चल रही याद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

जो साथ न मेरा दे पाये, उनसे कब सूनी हुई डगर?
मैं भी न चलूँ यदि तो क्या, राही मर लेकिन राह अमर।
इस पथ पर वे ही चलते हैं, जो चलने का पा गये स्वाद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

कैसे चल पाता यदि न मिला होता मुझको आकुल अंतर?
कैसे चल पाता यदि मिलते, चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर!
आभारी हूँ मैं उन सबका, दे गये व्यथा का जो प्रसाद –
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

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आलिंगन

December4

तुमसे नाराज़ हो , मैं सोचता हूँ
कितनी खरी खोटी सुनानी है तुम्हे
कितना लड़ना है
कितना ह्रदय दुखाना है तुम्हारा ….

लेकिन शाम मैं घर आता हूँ
और तुम आलिंगनबद्ध करती हो मुझे ….
मैं भूल जाता हूँ
अपने आप से किये वादे
आह ! मैं दुःखी न रह पाता हूँ
अपने को तुम्हारे प्रेम में बावरा पाता हूँ।

 

( Boston, 3  Dec 2013 )

 

Like mist

November22

Your thoughts pass through my soul

like the mist near Atlantic Wharf

they appear from nowhere

fill me with countless drops

of unbridled swirling emotions

and dissapear in nothingness.

The sun wonders

not a drop has rained

yet I am drenched.

 

( Boston, 11/22/13 )

 

 

 

 

मैं क्या करूँ ?

November21

अगर २२ मंज़िली ईमारत
कि सोलह माले पर भी
सर्दी कि धूप
मुझे ढूंढ कर गुदगुदा दे
तो मैं क्या करूँ ?

अगर रेल के अंदर बंद बंद भी
कुछ लाल पीले पतझड़ के निशाँ
मेरे muffler से आलिंगनबद्ध
मुझे जाने न दें ,
तो मैं क्या करूँ ?

अगर आज सुबह
तुम्हारी चाय कि गर्मी
इस सूखे दिन को
भर दें जिजीविषा से
तो मैं क्या करूँ ?

( Boston, 11/21/13 )

तुम कभी थे सूर्य / चंद्रसेन विराट

September13

This post has been taken from Kavitakosh 

 

तुम कभी थे सूर्य लेकिन अब दियों तक आ गये।
थे कभी मुख्पृष्ठ पर अब हाशियों तक आ गये ॥

प्रेम के आख्यान मे तुम आत्मा से थे चले ।
घूम फिर कर देह की गोलाईयों तक आ गये ॥

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तुम पड़ी हो by केदारनाथ अग्रवाल

May29

The original text is taken from Kavitakosh

तुम पड़ी हो शान्त सम्मुख

स्वप्नदेही दीप्त यमुना

बाँसुरी का गीत जैसे पाँखुरी पर

पौ फटे की चेतना जैसे क्षितिज पर

मैं तुम्हें अवलोकता हूँ ।

 

(My translation follows)

You lie peaceful on the bed

your body supine,

like a dream –

like the gleaming ganges in the evening sun

like the sound of a flute made of flowers

like the truth of dawn on horizon

I only look at you…

 

Boston, 5/29/13

Leave me as I am – Rita Petro

March26

( Taken from  http://www.albanianliterature.net/authors_modern1/petro_poetry.html)

Hindi translation has been taken from here. Translator: Siddheshwar Singh

रहने दो मुझे जैसी हूँ मैं
अगर नींद मुझे पकड़  लेती है पेड़ों के बीच
हो सकता मैंने पहने हों आधे – अधूरे कपड़े
रहने दो मुझे जैसी हूँ मैं।

पे्ड़ों को और मुझे भी
भाता है पहनने और निर्वसन होने का कौतुक
वे सूर्य के समक्ष करते हैं यह काम
और मैं तुम्हारे।

===

Leave me as I am,
If sleep finds me between those trees,
Even though I am only half-dressed,
Leave me as I am!
The trees and I
Love to dress and undress.
They do it in front of the sun,
I do it in front of you.

[Lermë kështu siç jam, from the volume Vargje të përfolura, Tirana 1994, p. 11. Translated from the Albanian by Robert Elsie]

पूर्णविराम

December16

ये उचित ही है,
की संबंधों के समाप्त होने पर,
सोचना बंद कर दिया जाये.
अर्धविराम से कहीं बेहतर है पूर्णविराम.

अधूरी अपेक्षाओं से,
किसी का उद्धार हुआ है कभी?

अर्धविराम = comma (,)
पूर्णविराम = period (.)

Boston / San Francisco , May 31, 2012.

for you.

August20

I’m late for the 7:55 train ,

will perhaps miss 8:19 too

Sunlight dancing through glass panes

asks, “Bhaiyyu, where are you?”

.

Its Autumn and the leaves of Maple

are dressed in a hundred shades of yellow

The ice cream truck is again on my street,

downstairs someone plays ‘The entertainer’ mellow

.

The world keeps enticing me

via its giggles, suggestions, chatters

but lying next to you my darling,

hardly anything matters.

.

– Cambridge, Massachusetts.  20 August 2012.

याद आया

August12
पिछली बारिश में धीमे भीगना याद आया,
तेरे साथ New York की सड़कों पर चलना याद आया.
.
हवा से बात करती मेरी पुरानी गाडी,
और तेरी जुल्फों का खुलना याद आया.
.
Central Park में बैठे हम और तुम,
पीछे Tulips का खिलना याद आया.
.
कतील शिफाई से Walt Whitman तलक,
तेरी खूबसूरती, तेरा मीठा बोलना याद आया .
.
इन्द्रधनुष में समायें हैं मदहोशी के सात रंग,
आज जो सोचा तेरे बारे, तो एक एक याद आया.
– Boston, 11 August 2012

Not written about anyone, Art for Art’s sake.

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Mulholland Drive, Van Gogh और दिल तो बच्चा है जी.

June24

पहली एक फिल्म है, दुसरे एक बेहतरीन कलाकार थे जबकि तीसरा एक गाना है. सभी में एक बात सामान्य है, और वो ये की तीनो ही protagonist की नज़र से किसी चीज़ को देखते हैं न की वास्तविकता से. कला की यही बात तो उसे मनुष्य की एक बेहतरीन कृति बनती है! Mulholland Drive में सपने और हकीक़त आपस में चीनी और पानी की तरह घुल मिल जाते हैं, इतना ज्यादा की दोनों में भेद करना असंभव हो जाता है. यहाँ में पाठकों को Mulholland Drive ( Connie Stevens) के Sixteen reasons why I love you गाने की याद दिलाना चाहूँगा. Naomi Watts को लगता है की director उसी को देख रहा है, जबकि वो तो Laura Harring से इश्क फर्मा रहा होता है. पूरा दृश्य Naomi के दृष्टिकोण से फिल्माया गया है!

Mulholland Drive - Sixteen reasons

Mulholland Drive - Sixteen reasons

अब Van Gogh को लीजिये. Starry Night नाम की एक बेहद उम्दा चित्र में रात उमड़ती हुई प्रतीत होती है. तारे घुमते हैं, हवा हिल्गोचे खाती है , चाँद सूर्य से भी ज्यादा दीप्त है… सब कुछ चित्रकार के मन मैं है! लेकिन देखिये वो एक तारे की रात को कैसा अलोकिक बना देता है! मैंने लन्दन में जब इनकी बनाई दृश्यों को देखा तो ठगा सा रह गया !

आखिर में इश्क्यियाँ का गाना ” दिल तो बच्चा है जी”. निर्देशक ने पूरा गाना ऐसे फ़रमाया है की वो खालुजान ( नसीरुद्दीन ) की भावनाओ को दिखता है.. शायद विद्या बालन ने कोई मामूली सी बात नसीर को कही होगी, लेकिन नसीर के किरदार ने उसके अनेक मतलब निकाले.. नसीर का किरदार ‘कृष्णा’ को प्यार करता है और उसे लगता है की कृष्णा भी करती है.. “the heart easily believes what it wants to believe or what it is afraid to believe” .. ज़रा शब्दों पे गौर फरमाईये ..

“किसको पता था ,पहलु में रखा,
दिल ऐसा बाज़ी भी होगा.
हम तो हमेशा, समझते थे कोई ,
हम जैसा हाजी ही होगा
हाए जोर करे, कितना शोर करे
… बेवजह बातों पे ऐंवे गौर करे…
दिल सा कोई कमीना नहीं”
— गुलज़ार

written Feb 1, 2010 @ Mumbai.

अब जबकि तुम इस शहर में नहीं हो ( शरद बिलौरे )

April26

(कवि मात्र 25 साल के थे जब 1982 में लू लगने से उनका निधन हो गया. )

इस कविता को समझने के लिए प्रेम में होना (या किसी समय रहा होना ) आवश्यक है. साधू!

कविताकोश के साभार ली गयी है ये रचना.

===

हफ़्ते भर से चल रहे हैं
जेब में सात रुपये
और शरीर पर
एक जोड़ कपड़े

एक पूरा चार सौ पृष्ठों का उपन्यास
कल ही पूरा पढ़ा,
और कल ही
अफ़सर ने
मेरे काम की तारीफ़ की।

दोस्तों को मैंने उनकी चिट्ठियों के
लम्बे-लम्बे उत्तर लिखे
और माँ को लिखा
कि मुझे उसकी ख़ूब-ख़ूब याद आती है।

सम्वादों के
अपमान की हद पार करने पर भी
मुझे मारपीट जितना
गुस्सा नहीं आया

और बरसात में
सड़क पार करती लड़कियों को
घूरते हुए मैं झिझका नहीं

तुम्हें मेरी दाढ़ी अच्छी लगती है
और अब जबकि तुम
इस शहर में नहीं हो
मैं
दाढ़ी कटवाने के बारे में सोच रहा हूँ।

सम्बन्ध by आभा बोधिसत्त्व

April15

यह कविता “कविताकोश” से ली गयी है. आभा बोधिसत्त्व जी दांपत्य जीवन के मर्म को समझती हैं, इस कविता के द्वारा….

चलो हम दीया बन जाते हैं
और तुम बाती …

हमें सात फेरों या कि “कुबूल है” से
क्या लेना-देना

हमें तो बनाए रखना है
अपने दिया-बाती के
सम्बन्ध को……… मसलन रोशनी

हम थोड़ा-थोड़ा जलेंगे
हम खो जाएँगे हवा में
मिट जाएगी फिर रोशनी भी हमारी
पर हम थोड़ी चमक देकर ही जाएँगे
न ज़्यादा सही कोई भूला भटका
खोज पाएगा कम से कम एक नेम-प्लेट
या कोई पढ़ पाएगा ख़त हमारी चमक में ।

तो क्या हम दीया बन जाए
तुम मंजूर करते हो बाती बनना।
मंजूर करते हो मेरे साथ चलना कुछ देर के लिए
मेरे साथ जगर-मगर की यात्रा में चलना….कुछ पल।

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शेष होते हुए

December16

A beautiful poem on ending relationships/ divorce by Govind mathur. This has been taken from Kavitakosh. This poem and the collection) got the poet Rajasthan Sahitya Academy award in 1986.

A simple poem, but very deep. Mr Mathur blogs at http://www.govind-mathur.blogspot.com/

इस तरीके से नही
पहले हमें
सहज होना होगा
किसी तनाव में
टूटने से बेहतर है
धीरे-धीरे
अज्ञात दिशाओं में
गुम हो जाएँ

हमारे सम्बन्ध
कच्ची बर्फ से नही
कि हथेलियों में
उठाते ही पिघल जाएँ
आख़िर हमने
एक-दूसरे की
गर्माहट महसूस की है

इतने दिनों तक
तुमने और मैंने
चौराहे पर खड़े हो कर
अपने अस्तित्व को
बनाए रखा है
ये ठीक है कि
हमें गुम भी
इस ही
चौराहे से होना है

पर इस तरीके से नही
पहले हमें
मासूम होना होगा
उतना ही मासूम
जितना हम
एक दूसरे से
मिलने के पूर्व थे

पहले मैं या तुम
कोई भी
एक आरोप लगाएंगे
न समझ पाने का
तुम्हें या मुझे
और फिर
महसूस करेगें
उपेक्षा
अपनी-अपनी

कितना आसान होगा
हमारा अलग हो जाना
जब हम
किसी उदास शाम को
चौराहे पर मौन खड़े होंगे

और फिर जब
तुम्हारे और मेरे बीच
संवाद टूट जएगा
कभी तुम चौराहे पर
अकेले खड़े होगें
और कभी मैं

फिर धीरे-धीरे
हमें एक दूसरे की
प्रतीक्षा नही होगी
कितना सहज होगा
हमारा अजनबी हो जाना
जब हम सड़कों और गलियों में
एक दूसरे को देख कर
मुस्करा भर देंगे
या हमारा हाथ
एक औपचारिकता में
उठ जाया करेगा

हाँ हमें
इतनी जल्दी भी क्या है
ये सब
सहज ही हो जाएगा
फिर हमें
बीती बातों के नाम पर
यदि याद रहेगा तो
सिर्फ़
एक-दूसरे का नाम

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Newton’s third law

November11

a) If you like someone, there is a good chance he/she will like you too
b) If you hate someone, it is certain that he/she will hate you.

But!

c) If you love someone, there is no guarantee that the favor will be returned.

Protected: निराशा का समाधान

September29

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रंग

August11

हज़ारों रंग में तुम
तुम में हज़ार रंग.
सात रंग में इन्द्रधनुष है, किन्तु
मात्र तुम में स्पंदन.

Boston, 11 August 2011

word meaning
स्पंदन – the essence of motion / heartbeat

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Protected: फोन

August2

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तितली

July14

तुम तितली हो
इठलाती, बल खाती
मुझे बावरा कर मंडराती,
हे मेरी तुम,
तुम मेरे जीवन की रागिनी हो.

Boston , 13 जुलाई 2011

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बगीचा

July5

बुझा बुझा सा है,
मेरा रंगीन बगीचा.
मानो लाल पीला नीला,
Daisy और hydangea ,
सब बदल गए मुरझाए सफ़ेद में.

तुम आओ,
मुस्काओ,
बगीचे में रंग भर दो.

हे मेरी तुम,
अपने रस से,
मुझे फिर से जीवित कर दो..

– 4 जुलाई 2011 , boston

वो लम्हे

June9

रुक जाता है New York ,
ठहर जातें हैं चलते कदम,
चुप हो जाती है सभी सडकें,
उन चंद लम्हों के लिए,
जब तुम मेरी किसी बात पर,
शर्माती हो…

8 जून २०११, Boston

New York stops.
footsteps stop,
and the streets turn silent,
for those few moments
When while listening to me,
you blush.

Protected: प्रेम के कारण

May10

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नहीं आयीं तुम

April27

नहीं आयीं तुम,

आज फिर से,
न कुछ लिखा ,
न कुछ बताया.
सब मन में छुपाया.
हे मेरी तुम,
क्यूँ हो ये राज़,
तुम्हारे मेरे बीच,
क्यों हो ये संबंध,
कडवे, संदेह से सींच?
* “हे मेरी तुम” केदार की अनेक रचनाओ का नाम है.

ये दिन – केदारनाथ अग्रवाल ( These days by Kedarnath Agrawal)

March22

Kedar often did not name his poems. The first lines were  the name of the poem, something I dont think makes sense. Have thus changed the name of this poem

भूल सकता मैं नहीं

ये कुच-खुले दिन,

ओठ से चूमे गए,

उजले, धुले दिन,

जो तुम्हारे साथ बीते

रस-भरे दिन,

बावरे दिन,

दीप की लौ-से

गरम दिन ।

(My translation follows)

Try yet I cannot forget,

these open breasted days –

kissed by your lips,

these bright, just bathed days.

The ones spent with you,

these sap filled days.

crazy days.

warm, –

warm like the candle flame days.

Heartless

November17

Do you proclaim me heartless,
incapable
of loving someone?

Like the yellow leaf of Maple Autumn;
A recipient of adulating eyes,
yet an apathetic passer-by?

========

Flirt, who wants to?
when the heart pines to hear
for the songs of soul
to be heard
through your breath
and your kiss
and your
togetherness.

– Varun. Nov 16, New York

Haiku

November9

When I plan to flirt ,
In NY’s Central Park
it never works
I
end up
making Haiku remarks.

इंतज़ार

June8

इंतज़ार में,
चुप हैं कलियाँ,
मुस्कुराएं जो तुम आओ,
आँख से आँख मिलाओ,
एकात्म हो जाओ.

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सध्य्स्रात तुम – दुष्यंत कुमार

June4

I am reading about astronomy these days, what are nakshatras, asterisms etc. Here is a poem by Dushyant Kumar, very much different from his usual style, that talks about eclipse and a women’s beauty. I find these poems, that club human love with Nature’s beauty, to be brilliant.

सध्य्स्रात तुम,
जब आती हो,
मुख कुन्तलों से ढका रहता है,
बहुत बुरे लगते हैं वो क्षण जब,
राहू से काल ग्रसा रहता है* !
( सध्य्स्रात = one who has just bathed ,
.कुन्तल = hair
राहू = an imaginary planet/demon which eats up sun and moon causing solar/lunar eclipses )

पर जब तुम
केश झटक देती हो अनायास
तारों सी बूँदें
बिखर जातीं हैं आसपास
मुक्त हो जाता है चाँद*
तब बहुत भला लगता है!

( अनायास = sudden
* this refers to passing of an eclipse )

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मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ: बशीर बद्र

March31

यह कविता कविता कोष / http://avinashkishoreshahi.wordpress.com/2010/03/30/ से ली गयी है.

मैं तमाम दिन का थका हुआ, तू तमाम शब का जगा हुआ
ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर, तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ

कई अजनबी तेरी राह के मेरे पास से यूँ गुज़र गये
जिन्हें देख कर ये तड़प हुई तेरा नाम लेके पुकार लूँ

प्यासा कुआँ – The thirsty well

March14

लोग कैसे लिख पाते हैं इतने सुन्दर शब्द? मैं हैरान हूँ! कैसे कवि ने “एक बुढाए कुआँ ” कह उसे एक व्यक्तित्व दे दिया है! आह! नमस्तुते कवि, नमस्तुते!

यह कविता http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%86%E0%A4%81_/_%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF से ली गयी है

प्यास बुझाता रहा था जाने कब से
बरसों बरस से
वह कुआँ
लेकिन प्यास उसने तब जानी थी
जब
यकायक बंद हो गया जल-सतह तक
बाल्टियों का उतरना
बाल्टियाँ- जो अपना लाया आकाश डुबो कर
बदले में उतना जल लेती थीं

प्यास बुझाने को प्यासा
प्रतीक्षा करता रहा था कुआँ, महीनों
तब कभी एक
प्लास्टिक की खाली बोतल
आ कर गिरी थी
पानी पी कर अन्यमनस्क फेंकी गई एक प्लास्टिक-बोतल
अब तक हैण्डपम्प की उसे चिढ़ाती आवाज़ भी नहीं सुन पड़ती

एक गहरा-सा कूड़ादान है वह अब
उसकी प्यास सिसकी की तरह सुनी जा सकती है अब भी
अगर तुम दो पल उस औचक बुढ़ाए कुएँ के पास खड़े होओ चुप।

[ Word meanings
यकायक = suddenly
जल-सतह = water surface
अन्यमनस्क = the feeling of finding something useless / absent mindedly
सिसकी = sniffle
औचक = surprised/ sudden ]

A Drinking Song – W B Yeats

February9

My sis asked me to find a poem on wine for her ladies club..and look what a gem I found!

“Wine comes in at the mouth
And love comes in at the eye;
That’s all we shall know for truth
Before we grow old and die.
I lift the glass to my mouth,
I look at you, and I sigh.”

रुबाई – जाँ_निसार_अख़्तर

February7

जब जाते हो कुछ भूल के आ जाते हो
इस बार मेरी शाल ही कर आए गुम

कहतीं हैं कि तुम से तो ये डर लगता है
इक रोज़ कहीं ख़ुद को न खो आओ तुम

http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%80:%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%८८

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बंद दरवाज़े

February1

बंद दरवाज़े,
आज खुले
एक अरसे बाद..

धूमिल हो गयी,
पर रेशमी परी,
की गुलाबी याद..

खुली तो आँखें,
पर क्या ही देखें,
‘साथ’ नहीं है साथ..

पुरानी बातें,
गुजरी रातें,
ख़त्म है उन्माद..

हम तो बोले,
वापस होलें,
काल कोठरी में पार्थ!

New Delhi Love song

October25

Sample this beautiful fusion poem from a certain Mr Michael Creighton, who teaches English in a school at Delhi. This poem appeared in the Mint Lounge edition of October 24 2009. This poem was tugged on the bottom right corner of the newspaper and would have most certainly missed my attention, had it not been for the wonderful rhyming pattern that caught my attention. Mr Creighton tries to capture the essence of Urdu Shayari style in English and does an excellent job. I think this is the first poem of its kind that I’ve read.

( For those who are new to Shayari – One of the characteristic things about Urdu couplets ( Shayari ) is that they follow the aa-ba-ba-ba format. While they not necessarily rhyme in the b-b part, the a-a part always matches. )

http://www.livemint.com/2009/10/23225111/New-Delhi-Love-Song.html


Smog and dust mix with the air in New Delhi.

I buy jasmine for her hair in New Delhi.

People come from everywhere to this city;

all are welcomed with a stare in New Delhi.

The finest things in life don’t come without danger.

Eat the street food, if you dare, in New Delhi.

We push in line and fight all day for each rupee.

Can you remember what is fair in New Delhi?

There is nothing you can’t find in our markets.

Socks and dreams sell by the pair in New Delhi.

So many families on the street through the winter;

Sometimes good men forget to care in New Delhi.

My friends ask, Michael, why’d you leave your own country?

I found jasmine for her here, in New Delhi.

सम्बोधन चिन्ह (ज्ञानेन्द्रपति )

September1

( This poem has been taken from http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A4%A8_%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%B9_/_%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF )

There are poems on love. There are poems on Nature. But there are some poems which coalesce both human love and the beauty of nature to produce something that ‘hits’ you. )

सम्बोधन चिन्ह

दिन की फुर्सत के फैलाव-बीच उगे

एक पेड़ के तने से

पीठ टिका कर

जब तुम एक प्रेम-पत्र लिखना शुरू करते हो

कुछ सोचते और मुस्कुराते हुए

तुम्हें अचानक लगता है

कोई तुम्हें पुकार रहा है

कौन है – किधर, इस सूनी दोपहर में

तुम मुड़कर वृथा देखते हो

कि कोई हौले से तुम्हारा कन्धा थपथपाता है

और तुम देखते हो तनिक चौंके-से

पेड़ है, एक पत्ते की अंगुली से छूता तुम्हें–

एक शरारती दोस्ताना टहोका

और तुम उस पेड़ को शामिल होने देते हो अपने सम्बोधन में

सम्बोधन चिन्ह की जगह.

Word meaning

[सम्बोधन चिन्ह = exclamation mark (!)

वृथा = without any reason, useless

हौले =  gently ]

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ट्राम में एक याद – ज्ञानेन्द्रपति

July26

http://anahadnaad.wordpress.com/2008/08/14/gyanendrapati-poem-tram-mein-ek-yaad/

ये कविता इस link से ली गयी है. वैसे तो मुझे ये यहाँ लिखनी नहीं चाहिए, किन्तु इतने सुन्दर शब्द से मैं मंत्रमुग्ध हो गया हूँ ! ज्ञानेन्द्रपति की इस कविता को पढना बहुत ज़रूरी है किसी भी काव्य प्रेमी के लिए…

ट्राम में एक याद

चेतना पारीक कैसी हो ?
पहले जैसी हो ?
कुछ-कुछ खुश
कुछ-कुछ उदास
कभी देखती तारे
कभी देखती घास
चेतना पारीक, कैसी दिखती हो ?
अब भी कविता लिखती हो ?
तुम्हें मेरी याद न होगी
लेकिन मुझे तुम नहीं भूली हो
चलती ट्राम में फिर आँखों के आगे झूली हो
तुम्हारी कद-काठी की एक
नन्ही-सी, नेक
सामने आ खड़ी है
तुम्हारी याद उमड़ी है
चेतना पारीक, कैसी हो ?
पहले जैसी हो ?
आँखों में अब भी उतरती है किताब की आग ?
नाटक में अब भी लेती हो भाग ?
छूटे नहीं हैं लाइब्रेरी के चक्कर ?
मुझ-से घुमंतू कवि से होती है टक्कर ?
अब भी गाती हो गीत, बनाती हो चित्र ?
अब भी तुम्हारे हैं बहुत-बहुत मित्र ?
अब भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो ?
अब भी जिससे करती हो प्रेम उसे दाढ़ी रखाती हो ?
चेतना पारीक, अब भी तुम नन्हीं सी गेंद-सी उल्लास से भरी हो ?
उतनी ही हरी हो ?

उतना ही शोर है इस शहर में वैसा ही ट्रैफिक जाम है
भीड़-भाड़ धक्का-मुक्का ठेल-पेल ताम-झाम है
ट्यूब-रेल बन रही चल रही ट्राम है
विकल है कलकत्ता दौड़ता अनवरत अविराम है
इस महावन में फिर भी एक गौरैया की जगह खाली है
एक छोटी चिड़िया से एक नन्ही पत्ती से सूनी डाली है
महानगर के महाट्टहास में एक हँसी कम है
विराट धक-धक में एक धड़कन कम है कोरस में एक कंठ कम है
तुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते हैं उतनी जगह खाली है
वहाँ उगी है घास वहाँ चुई है ओस वहाँ किसी ने निगाह तक नहीं डाली है
फिर आया हूँ इस नगर में चश्मा पोंछ-पोंछ कर देखता हूँ
आदमियों को   किताबों को   निरखता लेखता हूँ
रंग-बिरंगी बस-ट्राम     रंग-बिरंगे लोग
रोग-शोक   हँसी-खुशी   योग और वियोग
देखता हूँ अबके शहर में भीड़ दूनी है
देखता हूँ तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है
चेतना पारीक, कहाँ हो कैसी हो ?
बोलो, बोलो, पहले जैसी हो ?

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क्षत विक्षत

April5

कॉफी की एक चुस्की लेते हुए
वो देखे मुझे,

उसके चेहरे पे एक लट

मैं खो जाऊं कहीं
मेरा हृदय क्षत विक्षत…

( क्षत विक्षत – टुटा हुआ, चकनाचूर जैसे की कांच की टूटी बोतल

चुस्की – sip  )

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क्षोभ

March11

अतृप्त मैं,
सुदीप्त तुम.
‘औ हमारे मध्य,
अकथ्य खालीपन..

 

( क्षोभ = sadness with a tinge of anger

अतृप्त = unsatisfied

सुदीप्त =  beautiful, bright 

अकथ्य = What couldn’t be said)

हे मेरी तुम!

February15

केदारनाथ अग्रवाल की कवितायेँ मुझपे जादू कर देती हैं। वे इतनी सुंदर होती हैं, की मन झंकृत हो उठता है। मसलन यह नमूना देखिये। कवि इसे अपनी octogenarian पत्नी के लिए लिखता है, और कितने कम शब्दों ( 27 शब्द मात्र!) में ही कितना कुछ कह जाता है॥

(http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=हे_मेरी_तुम_!.._/_केदारनाथ_अग्रवाल)

हे मेरी तुम !
बिना तुम्हारे–
जलता तो है
दीपक मेरा
लेकिन ऎसे
जैसे आँसू
की यमुना पर
छोटा-सा
खद्योत
टिमकता,
क्षण में जलता
क्षण में बुझता ।

( खद्योत = एक छोटी सी नाव जिसपे एक दीपक रखकर नदी में बहाया जाता है, हरिद्वार में प्रचलित)

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वो

April13

(This poem was written in January 2008 while I was walking on the road outside the US Embassy in New Delhi.)

दुनिया मैं हैं अनेक सुंदर चेहरे,

ये बात है मुझे अच्छी तरह पता।

ऐसा नही कि वो सबसे अलग,

ये चीज़ भी अच्छी तरह मैं जानता ।

लेकिन दिल्ली की किसी सड़क पर,

जब एक हवा का झोंका,

उसके बालों को बिखरा देता है,

उसके साथ बैठे हुए-

जाने क्यों,

मन में एक टीस उभर आती है ।

जाने क्यों,

साँस एक पल ही सही,थम सी जाती है

मैं आँखें कहीं और मोड़ लेता हूँ,

जाने क्या सोचने लगता हूँ ……

Word Meaning

{ टीस = nostalgic pain

झोंका = gust of wind }

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तेरे बिना वो बात नही…

February25

सीताराम भारतीय की खाली कुर्सी,
उदास आधा चेहरा झुकाए,
करती रहती है किसका इंतज़ार?

इंडिया गेट पे इठलाती हुई शाहजहाँ रोड,
किसी के आने की राह देखते हुए,
है किस कि हँसी सुनने को बेकरार ?

ये कुतुब कि सड़कें,
सुंदर काले रंग का दुपट्टा ओढे,
क्यू हैं किसी का चेहरा देखने को तैयार?

सारे गाने वोही तो हैं,
सारे पकवान यही तो हैं,
देखो सब कुछ तो है वही ,
हर चीज़ अपने स्थान पर खड़ी सही,
पर जाने क्यों लगता है तेरे बिना,
तेरे बिना वो बात नही…..

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My first Post

November22

Decadence is setting in. My ideas & ethics are dying and am everyday getting more and more materialistic.

A number of thoghts cross my mind everyday. This is an attempt to word my emotions on a gamut of things.

If you’re here to find some fun stuff, you’ll be dissapointed. This is meant to be more of a chronicle rather than an intellectual/entertainment portal!

However, if you’re here to see what have i been up to; you’re more than welcome.

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