Archive for the Category »Dev D «

देव डी का गाना. बहुत ढूँढा लेकिन कहीं मिला ही नहीं. दुनिया इमोशनल अत्याचार को सुनती रहती है और सीपी (oyster)  में छुपे इस मोती को किसी ने देखा ही नहीं!!

 

उतरा उतरा मौसम ढलके

पलकों में

कतरा कतरा पी लूं

आ इस पल को मैं

(Katra = small drop of liquid) 

 

सूरज की कुछ बूँदें

टपकी हैं पेशानी(?) पे

सरगोशी खुद से करती हूँ,

मैं हैरानी में

(sargoshi  = whisper)

येही मेरी ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी ज़िन्दगी

येही मेरी ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी ज़िन्दगी

येही मेरी ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी ज़िन्दगी

येही मेरी ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी ज़िन्दगी

 

(music)

 

ये मेरे पल

मेरे दिन,

जैसे हों,

चंद सब्ज़ शाखें

एक शजर पे खिलीं.

( sabz = full of colour ,green ;   shajar = tree)

 

(हो)

है मेरे सब सपने रंग राज़

जीले भर के

जीवन में ले के उजाले

खिलखिलाते

मैं तो उड़ चली

कुदरत मुस्कराती है मेरी नादानी पे,

सरगोशी खुद से करती हूँ,मैं हैरानीमें

( naadani = naivity)

येही मेरी ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी ज़िन्दगी

येही मेरी ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी ज़िन्दगी

येही मेरी ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी ज़िन्दगी

येही मेरी ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी ज़िन्दगी

 

उतरा उतरा मौसम ढलके

पलकों में

कतरा कतरा पी लूं आ इस पल को मैं

गाना
इतना खूबसूरत है की माशा अल्लाह! कहीं भी गीत के बोल नही मिले, इसीलिए
स्वयं ही लिख रहा हूँ. आपकी मेहेरबानी होगी अगर आप कोई त्रुटियां निकलने
में सहायक हों!


(ओ चला चल) -२ छा गया मुझ पे जादू करके
वारी तोपे जाऊं मैं सदके
ढोल यारा ढोल,ढोल यारा ढोल

मन में मेरे हूक उठी है,
कोयल जैसे कूक उठी है
ढोल यारा ढोल,ढोल यारा ढोल
मौज के, पींग (?) के झू लूँ,
दे दे मोहे हाथ दे दे, दे दे मोहे हाथ
अम्बर उड़ के छु लूँ
तोरे साथ साथ सजना, तोरे साथ साथ
पाँव में घुंघरू बाजे रे
यातानिया (?) बिंदिया साजे रे
साग (?) में डूबी हाय ..

छा गया मुझ पे जादू करके
वारी तोपे जाऊं मैं सदके
ढोल यारा ढोल,ढोल यारा ढोल
मन में मेरे हूक उठी है,
कोयल जैसे कूक उठी है
ढोल यारा ढोल,ढोल यारा ढोल

ओ ओ ओ
ओ राँझना मेरे यार
तोरे संग तोरे संग रंग रंगाई
प्रीत में तोरी मैं हूँ नहाई
खुशियों की खटिया होगी
संग होंगे हम तुम यारा
वाह वाह रे वाह वाह….
प्रीत में बावरी हो जाऊं मैं,
जिस्म का टोल(?) आँचल ओढ़ लूँ मैं,
तुज्पे कुर्बान कुरबां हो जाऊं मैं
(हो)
तू संग तो बात बन जाए…
तू संग तो बात बन जाए…
तू संग तो बात बन जाए…

छा गया मुझ पे जादू करके
वारी तोपे जाऊं मैं सदके
ढोल यारा ढोल,ढोल यारा ढोल
मन में मेरे हूक उठी है
, कोयल जैसे कूक उठी है

ढोल यारा ढोल,ढोल यारा ढोल

रात के १ बजे मैं फ़िल्म review लिख रहा हूँ, ये इस बात का प्रमाण है की मैं अभी तक देव डी के नशे से बहार नही आ पाया हूँ,. देखिये साहब सीधी सीधी बात है. या तो आपको ये फ़िल्म बेहद पसंद आयेगी, या आपको ये एक इमोशनल अत्याचार के सिवा और कुछ न लगेगा. मैं पहली श्रेणी में अपने को पाता हूँ. लोग कह सकते हैं की ये एक व्यभिचारी फ़िल्म है और उन्हें इसमे सस्ते व्यंग्य की बू आ सकती है, या मेरी नज़रिए से देखें तो अपने को बर्बाद करने का जूनून सर चढ़ कर बोलता है. पागलपन है एक जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है. मुझे क्या पसंद आया? पता नही , सच में पता नही. अगर मैं आपसे पूछूँ की भई बिरयानी में चावल अच्छा था, या नमक अच्छा था, या कर्री अच्छी थी, तो आप क्या कहेंगे? पता नही न? ठीक वैसे ही मुझे नही पता की साला इस फ़िल्म में ऐसा क्या था जो मुझे किसी हथौडे की तरह ‘hit’ कर गया. शायद चंडीगढ़ में रहने की वजह से और दिल्ली के दरियागंज की सड़क का दृश्य या फिर कैमरे के विभिन्न कोण, या फिर संगीत, या कोकीन के शॉट्स, या सिगरेट का dhuaN …उम्म्म पता नही. साला शाहरुख़ की देवदास देख में सोचता ही रह गया की B.C., किसी को इस फ़िल्म में ऐसा क्या लगा की ९ और बन गयीं इस उपन्यास के ऊपर. और देव डी को देख मैंने सोचा, अनुराग कश्यप, केवल तुम इस बर्बादी को समझ पाए हो. पागलपन है साहब, बस पागलपन.

Decadence is setting in. My ideas & ethics are dying and am everyday getting more and more materialistic.

A number of thoghts cross my mind everyday. This is an attempt to word my emotions on a gamut of things.

If you’re here to find some fun stuff, you’ll be dissapointed. This is meant to be more of a chronicle rather than an intellectual/entertainment portal!

However, if you’re here to see what have i been up to; you’re more than welcome.