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There isn’t much that now you can do

So have a smoke and melt in the night dew

Listen to the tick tock of your pocket clock

Wondering if naught is all, all things come to.

Or probably you can have a beer

And look at your despicable self with a sneer

Mediocre you, always knew,

My efforts were impotent, there or here.

So sip the whiskey, soda and scotch

Sit alone on the backside porch

Lo and Behold! As the truth be told

“You were always useless”, Says the watch.

बचपन में एक कहानी पढी थी। किसी ऋषि को एक चुहिया मिली। उसने उस चुहिया को मानव रुप दिया और कहा,”आज से तुम मेरी बेटी हो”। समय बीता और वह रूपवती परिपक्व हो गयी। सवाल आया कि उससे शादी लायक लड़का कहाँ से ढूंढें? ऋषि को लगा सूर्य सबसे बलवान है, अतः वह सूर्य के पास गया और कहा कि हे सूर्य देव, आप मेरी पुत्री से विवाह कर लें!
सूर्य ने कहा, “आपकी आकांक्षा मेरे सर माथे, किन्तु बादल मुझसे शक्तिशाली है क्योंकि वह मेरी किरणों को रोक देता है, आप उसे विवाह योग्य वर माने” । ऋषि बादल के पास गए, किन्तु उसने कहा पर्वत सबसे शक्तिशाली है क्योंकि वह मेरा रास्ता रोक देता है… आप गिरिराज हिमालय के पास जाएँ। हिमालय ने कहा,” हे सिद्ध आत्मा, एक चूहा मेरे में बिल खोद कर मुझे खोखला कर देता है, मेरी सारी शक्ति धरी कि धरी रह जाती है। आप तो मूषक के पास जाएँ।”
चूहे ने कहा -” ऋषिदेव, मनुष्य प्रजाति से मेरे को डर लगता है, आप अगर रूपवती को चुहिया बना दें तो मैं उससे विवाह कर सकता हूँ” । ऋषि ने तधास्तु कह उसे फिर से चुहिया बना दिया और वे दोनो ख़ुशी ख़ुशी विवाहत्तर जीवन जीने लगे
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जाने क्यों सिरसा से आते वक़्त यह कहानी बार बार मेरे मन में आती रही। मैंने अपने जीवन की बारे में सोचा। मेरे CV को अगर कोई देखें, तो प्रभावित हुए बिना नही रह सकता। उसमे आपको मेरे व्यक्तित्व के कई बेजोड़ नमूने देखने को मिलेंगे। लगेगा कि वाह! क्या मेहनत से लड़के ने ये सभी पुरस्कार जीते हैं। जहाँ जहाँ CV डाला, वहाँ वहाँ वह shortlist भी हुआ। लेकिन अगर मैं सच में उन चीजों के बारे में सोचुँ तो मुझे ख़ुशी कम और दुःख ज्यादा होता है।
मेरी सफलता के पीछे लगता है कि कितने त्याग भी हैं। हर उपलब्धि मालुम पड़ता है जैसे जीभ चिढा रही हो । मानो ये कह रही हो कि “मुझे पाकर भी तुमने क्या हासिल कर लिया?”। ये सब CV के मुद्दे केवल कागज़ पे छिपे काली स्याही के बेढब अक्षरों से अधिक कुछ नही लगते …. और हर बार जब मैं उन्हें पढता हूँ तो मुझे अपने से उतनी ही अधिक घिन्न होती है। याद आता है कि कितना समय जो मैंने कैशोनोवा में बर्बाद किया, वो मित्रों और परिवार के पास जा सकता था। कितना समय जो मैंने PEC की बेवकूफियों में व्यर्थ किया वो मेरी माँ के पास जा सकता था। मेरे माता पिता अकेले रहते हैं अजमेर में और अपनी इस इनवेस्टमेंट बैंकिंग की नौकरी कि वजह से मैं उन्हें और अपने परिवार एवं मित्रो को पूरा समय नही दे पाऊँगा।
याद आता है कि मैंने जानबूझ कर कभी मन में किसी के प्रति सच्चे प्रेम की भावना नही आने दी…क्योंकि वह मुझे आगे बढ़ने से रोक देती। अपने को किसी भी सुन्दर चीज़ के लिए रुकने नही दिया क्योंकि मुझे सदैव प्रथम रहना था। वरुण अग्रवाल भला कभी पीछे कैसे रह सकता है?
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ये चूहे और मनुष्य की कहानी मैं भूल गया था। लेकिन सरसों के खेत, मिट्टी की खुशबू, बस में सफर , रेल की पटरी और शादी देखकर याद आया की मैं भी अधिकाधिक एक चूहा ही तो हूँ । मैं भी हमेशा अपने को और बेहतर बनने के लिए नए लक्ष्य ढूँढता रहता हूँ और आखर में मालूम पड़ता है कि एक सादा मनुष्य बनना ही अच्छा होता -

फलानुसार कर्म के, अवश्य बाह्य भेद हैं।

परन्तु अंतः एक है, प्रमाण भूत वेद हैं॥

मैं असंख्य छोटे MBA में से एक हूँ, यह बात मैं अच्छी तरह जानता हूँ। यह भी सत्य है कि मेरे से अच्छे बहुत सारे लोग हैं। और इसमे भी कोई शक नही कि काफी सारे लोग मेरे से बेहतर company deserve करते हैं ।

लेकिन तब भी, मेरी असली कीमत क्या है? मैं I Banker बनूँगा कि नही, ये बात एक HR कैसे निर्धारित कर सकता है? वह मेरे से 6- 7 सवाल पूछ के यह कैसे बता सकता है कि मेरे में ‘वो’ बात है कि नही? मैं यह नही कहता कि मैं सबसे चतुर हूँ, लेकिन मैं किसी से कम भी नही हूँ।

नही lehman , तुम गलत हो। तुम मेरे भविष्य का फैसला नही कर सकते। तुम मेरे आने वाले कल कि भविष्यवाणी करने के काबिल ही नही हो। मैं यह प्रमाणित करके दिखाऊँगा कि मैं भी एक I Banker बन सकता हूँ, ……. न केवल बनने के सक्षम हूँ, बल्कि मैं इतना अच्छा बनूँगा कि तुम्हे ग़म होगा कि तुमने मुझे आज क्यों नही लिया जब मैं पूरे दिल से तुम्हारे पास आने के लिए दो साल से मेहनत कर रहा था ।

मैं साबित करूंगा कि मुझे न लेने का तुम्हारा निर्णय कितना गलत था…..

” कशमकश को छोड़ दे तू,
रुख हवा का मोड़ दे तू
खाली पैमाना है तेरा,
हो सके तो तोड़ दे तू”

ESNIPS पे “हम लायें हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के ….” गाना सुनते हुए याद आया कि छब्बीस जनवरी पास आ गयी है। याद आया कि फिर से स्कूली बच्चों को जबरदस्ती राजपथ ले जाया जाएगा और मैं ख़ुशी ख़ुशी सोचूंगा कि चलो एक छुट्टी और मिली।

तभी याद आया कि मेरे दादाजी (बाबा) और दादीजी (अम्मू) भी शामिल थे स्वतंत्रता सेनानियों में और अनगिनित गांधीवादियों कि तरह उनके भी जेल जान पड़ा था। दोनो कि तबियत भी काफी खराब हुई थी उस दौरान। बाबा और अम्मू दोनो ही संपन्न परिवारों से ताल्लुक रखते थे और उन्हें कोई आवश्यकता नही थी अपने स्निग्ध जीवनशैली त्याग के ,जेल के एक बैरक में बासी रोटी और अधपकी दाल खाने की। लेकिन उन्होने ऐसा किया, कुछ अपनी पीढ़ी के लिए, कुछ मेरी पीढ़ी के लिए और कुछ मेरी आने वाले पीढियों के लिए।

बाबा अब नही रहे, अम्मू से अगर पूछों कि आपने क्यों इतना त्याग किया तो वो कहेंगी कि उस समय का उन्माद ऐसा ही था। वे कहेंगी कि कुछ इतनी बड़ी बात भी नही थी। किन्तु जिस चीज़ के लिए आपने इतनी मेहनत की, उस की कीमत हम में से कोई न समझा।

एक PEPSI पीते , McD का burger खाते और GRE देके पहले मौक़े में अमरीका जाते हुए आपके अयोग्य पौत्र की ओर से शत् शत् नमन .

मुझे मामा के साथ बात करना पसंद है क्यूंकि हर बार उनसे बात करने पर कुछ नया सीखने को मिलता है और उनका point of view मुझे एक और दिशा दिखता है।

उनसे बात करने से मुझे प्रेरणा मिलती है कि मैं सतत बेहतरी के पथ पर बढूँ। हम रूक नही सकते। हम थक भी नही सकते। मैं नही सोच सकता था कि मैं कभी Oxford/LSE/Stanford कि बातें करूंगा। शायद मैं उन जगह न भी पहुंच पाऊँ, लेकिन यह बात कि आज कमसकम मैं वहाँ जाने की तमन्ना रखता हूँ, क्या यही कुछ कम है?

यह मत सोचो कि अभी क्या मिल रहा है, यह सोचो कि आज से ५ साल या १० साल बाद क्या मिलेगा ।हम जीते या हारे, ये मेरा bhavishya teh करेगा न कि मेरा vartmaan

आहूति बाक़ी, यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
वर्तमान के मोहपाश में ,
आने वाला कल न भुलाएं,
आओ फिर से दिया जलायें! “
~~ वाजपेयी , आओ फिर से दिया जलायें

कौन मूरख़ है? क्या वो जो धीरे सोचता है , या वो जो धीमे काम करता है, या वो जो पढाई अथवा खेल-कूद में पिछड़ा है?क्या वो जो अजीब सवाल पूछता है या वो जो अजीब बातें करता है ,या फिर वो जिसका काटने में सबसे अधिक आनंद आता है?

कहना मुश्किल है ! लेकिन ज़रा सोच के देखिये, हम सब जीवन के किसी न किसी मोड़ पे, कुछ मूर्ख़ता नही करते है? एक सवाल उभरता है…. क्या हम सब, किसी न किसी की नज़रों में मूर्ख नही हैं?

हमे क्या अधिकार है की किसी का मजाक उडायें ? हमे क्या अधिकार है की किसी और की बुराई करें ? ख़ुद में कभी झांक कर तो देखे की आखर हम कौन बड़ी तोप है जो दूसरे को गधा कहे!

फुददु वो है जो अपने को दूध का धुला समझे और सोचे की उससे बेहतर व्यक्ति नज़र नही आता. नज़र उठा के देख आदम!! हर वो चीज़ जो मै करता हूँ, मुझसे १०० गुना बेहतर कोई और कर सकता है, और हर वो चीज़ जिसपे तुम इतराओ , उससे १०० गुना वोही किसी और के पास भी हो

“बना है शाह का मुसाहिब , फिरे है इतराता
वरना शहर में गालिब की आबरू क्या है “

Decadence is setting in. My ideas & ethics are dying and am everyday getting more and more materialistic.

A number of thoghts cross my mind everyday. This is an attempt to word my emotions on a gamut of things.

If you’re here to find some fun stuff, you’ll be dissapointed. This is meant to be more of a chronicle rather than an intellectual/entertainment portal!

However, if you’re here to see what have i been up to; you’re more than welcome.