ये दोनों कवितायेँ ‘अनुभूति‘ से ली गयी हैं.
उड़ते हुए
कभी
अपने नवजात पंखों को देखता हूँ
कभी आकाश को
उड़ते हुए
लेकिन ऋणी मैं फिर भी
ज़मीन का हूँ।
जहाँ तब भी था - जब पंख ही न थे
तब भी रहूँगा जब पंख झर जाएँगे।
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ख़तरे
ख़तरे पारदर्शी होते हैं।
खूबसूरत।
अपने पार भविष्य दिखाते हुए।
जैसे छोटे से गुदाज़ बदन वाली बच्ची
किसी जंगली जानवर का मुखौटा लगाए
धम्म से आ कूदे हमारे आगे
और हम डरें नहीं।
बल्कि देख लें
उसके बचपन के पार
एक जवान खुशी
और गोद में उठा लें उसे।
ऐसे ही कुछ होते हैं ख़तरे।
अगर डरे तो ख़तरे और अगर
नहीं तो भविष्य दिखाते
रंगीन पारदर्शी शीशे के टुकड़े।

