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अतृप्त मैं,
सुदीप्त तुम.
‘औ हमारे मध्य,
अकथ्य खालीपन..

 

( क्षोभ = sadness with a tinge of anger

अतृप्त = unsatisfied

सुदीप्त =  beautiful, bright 

अकथ्य = What couldn’t be said)

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काफी लोगों ने कहा है की अपना ऑक्सफोर्ड का interview experience कहीं लिख दूं. आप सभी के लिए यहाँ post कर रहा हूँ. क्यूंकि कुछ लोग हिंदी नहीं जानते, सो अंग्रेजी में लिख रहा हूँ.

My MFE (Masters in Financial Economics) interview was scheduled at 9 30 Am on 27 Feb ‘ 09. As this was a telephonic format, i had to call an international Number at 3 PM IST. I booked a conference room in my company and called Mr Alan Morrison(AM), My interviewer, at 5 mins to 3.

Me-> can I speak to prof Morrison?
AM-> Hello, i guess you’re calling for an MFE interview. Ok, Tell me why you want to join oxford.

AM-> Why MFE

AM-> Tell me about securitization market in India
I told him abt the dynamics, both present and past

AM-> who are the players?
Me- MFs, LIC, Banks Etc

AM-> why do you securitize?
Me-> profit/CAPAD/Liquidity

AM -> Compare US and Indian MBS/ABS
Me-> told abt structures, AAA nature, wat gets sold etc

AM-> WHy do people buy these PTC in India
ME-> told good return, no default. AM seemed interested

AM-> Can US Subprime happen in India?
me-> No.OFS not present. CDO square not present

AM-> Tell me abt pricing of ABS
Me-> Risk Free+ premiums

AM-> OK, you have done MBA.tell me about Miller modigillani propositions.
me-> told him abt prop 1 and prop 2

AM-> connect Miller modigillani proposition 2 with Securitization market i India?
Me-> Stupified. Didn’t get the question.

AM-> Tell me why is a 300 bips spread between AAA and AAA(so) ?
me-> liquidity premium

AM-> Thanks, Any questions?
Me-> scholarship?
Me-> why has TARP sometimes given only $ 1 as aid to some banks?

AM-> Responded.
AM-> Thanks for calling us, expect result on 27 march.

Me- Thanks.

Interview lasted for about 15 mins. Overall it was OK. No cross questioning.It was much more technical than I had expected. I was satisfied, don’t know what will happen although

टन्न्न्न!

कभी धरातल
कभी आकाश,
कभी अँधेरा
कभी प्रकाश..

ऊपर नीचे,
नीचे ऊपर
लिफ्ट के बीच खडा मैं,
और मेरे विचारों के बवंडर ..

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कोई 8 - 10 साल पहले की बात है. शाम का वक़्त था और पापा फूलों को पानी दे रहे थे. मैं भी खडा था बाजू में. पाने की बूँदें जब पत्तों पे गिरी तो पापा ने कहा, “देखो फूल कितने खुश हैं और कैसे झूम रहे हैं!” . मैं उन दिनों अजीब सा था. कहा,” फूल खुश-वुश नहीं हैं . पानी उनपे गिरा तो जाहिर हैं यहाँ वहाँ हो गए वो पानी के वेग से.”

हमारे नज़रिए अलग थे.
—-

आज मेरे बॉस ने मुझे मेरी एक गलती का एहसास दिलाया. उनकी एक बात ठीक लगी, लेकिन दूसरी बात मुझे बहुत चुभी. फिर दुःखी दुःखी सा रेलवे स्टेशन पहुंचा. बांद्रा स्टेशन मुझे एक भद्दा कबाड़खाना प्रतीत हुआ. ट्रेन में लगा की कैसे भेड़ बकरी से लोग भरे हुए हैं. फिर विले परले स्टेशन पर वोही बुरी सी चीज़ लगी. बाहर सड़क भी गन्दी लग रही थी. कुछ अच्छा नहीं लगा.

अब अपने कमरे में बैठ, पापा की बात याद आ रही है. जहाँ पापा को खूबसूरती नज़र आ रही थी, वहीँ मेरे को कुछ ख़ास नहीं लग रहा था. आज तक मेरे को ट्रेन, बांद्रा स्टशन और मेरे घर के सामने वाली सड़क बुरे लगने लगे- जो कल तक मुझे प्रसन्नचित्त कर देते थे.

न ट्रेन बुरी है, न स्टेशन बुरा है और ना ही मेरी सड़क इतनी गन्दी है. बस मेरी नज़र अलग है

“Beauty lies in eyes of the beholder” - proverb

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पाठकों को जानकर खुशी होगी ki मुझे Oxford MFE -2009 program से इंटरव्यू कॉल आई है. मेरा साक्षात्कार २७ फ़रवरी को होना तय हुआ है. किंतु मेरे को मालूम नही की विदेशी प्रबंधन विश्वविद्यालय में किस प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं.

अगर आप में से किसी का इस प्रकार का साक्षात्कार हुआ है, तो कृपया मुझे बताने की कृपा करें!

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21
Feb


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

गाना
इतना खूबसूरत है की माशा अल्लाह! कहीं भी गीत के बोल नही मिले, इसीलिए
स्वयं ही लिख रहा हूँ. आपकी मेहेरबानी होगी अगर आप कोई त्रुटियां निकलने
में सहायक हों!


(ओ चला चल) -२ छा गया मुझ पे जादू करके
वारी तोपे जाऊं मैं सदके
ढोल यारा ढोल,ढोल यारा ढोल

मन में मेरे हूक उठी है,
कोयल जैसे कूक उठी है
ढोल यारा ढोल,ढोल यारा ढोल
मौज के, पींग (?) के झू लूँ,
दे दे मोहे हाथ दे दे, दे दे मोहे हाथ
अम्बर उड़ के छु लूँ
तोरे साथ साथ सजना, तोरे साथ साथ
पाँव में घुंघरू बाजे रे
यातानिया (?) बिंदिया साजे रे
साग (?) में डूबी हाय ..

छा गया मुझ पे जादू करके
वारी तोपे जाऊं मैं सदके
ढोल यारा ढोल,ढोल यारा ढोल
मन में मेरे हूक उठी है,
कोयल जैसे कूक उठी है
ढोल यारा ढोल,ढोल यारा ढोल

ओ ओ ओ
ओ राँझना मेरे यार
तोरे संग तोरे संग रंग रंगाई
प्रीत में तोरी मैं हूँ नहाई
खुशियों की खटिया होगी
संग होंगे हम तुम यारा
वाह वाह रे वाह वाह….
प्रीत में बावरी हो जाऊं मैं,
जिस्म का टोल(?) आँचल ओढ़ लूँ मैं,
तुज्पे कुर्बान कुरबां हो जाऊं मैं
(हो)
तू संग तो बात बन जाए…
तू संग तो बात बन जाए…
तू संग तो बात बन जाए…

छा गया मुझ पे जादू करके
वारी तोपे जाऊं मैं सदके
ढोल यारा ढोल,ढोल यारा ढोल
मन में मेरे हूक उठी है
, कोयल जैसे कूक उठी है

ढोल यारा ढोल,ढोल यारा ढोल

रात के १ बजे मैं फ़िल्म review लिख रहा हूँ, ये इस बात का प्रमाण है की मैं अभी तक देव डी के नशे से बहार नही आ पाया हूँ,. देखिये साहब सीधी सीधी बात है. या तो आपको ये फ़िल्म बेहद पसंद आयेगी, या आपको ये एक इमोशनल अत्याचार के सिवा और कुछ न लगेगा. मैं पहली श्रेणी में अपने को पाता हूँ. लोग कह सकते हैं की ये एक व्यभिचारी फ़िल्म है और उन्हें इसमे सस्ते व्यंग्य की बू आ सकती है, या मेरी नज़रिए से देखें तो अपने को बर्बाद करने का जूनून सर चढ़ कर बोलता है. पागलपन है एक जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है. मुझे क्या पसंद आया? पता नही , सच में पता नही. अगर मैं आपसे पूछूँ की भई बिरयानी में चावल अच्छा था, या नमक अच्छा था, या कर्री अच्छी थी, तो आप क्या कहेंगे? पता नही न? ठीक वैसे ही मुझे नही पता की साला इस फ़िल्म में ऐसा क्या था जो मुझे किसी हथौडे की तरह ‘hit’ कर गया. शायद चंडीगढ़ में रहने की वजह से और दिल्ली के दरियागंज की सड़क का दृश्य या फिर कैमरे के विभिन्न कोण, या फिर संगीत, या कोकीन के शॉट्स, या सिगरेट का dhuaN …उम्म्म पता नही. साला शाहरुख़ की देवदास देख में सोचता ही रह गया की B.C., किसी को इस फ़िल्म में ऐसा क्या लगा की ९ और बन गयीं इस उपन्यास के ऊपर. और देव डी को देख मैंने सोचा, अनुराग कश्यप, केवल तुम इस बर्बादी को समझ पाए हो. पागलपन है साहब, बस पागलपन.

उसके मटमैले नैन ,
मेरे मर्म को
पिघला देते हैं..

और मैं,
मैं पानी बन जाता हूँ.

टप टप..
टप टप..

अपनी आंखों से बह जाता हूँ.

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कांक्रीट के जंगल में,
टूटी पत्ती का
मादक नृत्य देख,
हुआ मुझे भी एहसास.
जिंदा हूँ मैं,
चलती है मेरी भी साँस.

केदारनाथ अग्रवाल की कवितायेँ मुझपे जादू कर देती हैं। वे इतनी सुंदर होती हैं, की मन झंकृत हो उठता है। मसलन यह नमूना देखिये। कवि इसे अपनी octogenarian पत्नी के लिए लिखता है, और कितने कम शब्दों ( 27 शब्द मात्र!) में ही कितना कुछ कह जाता है॥

(http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=हे_मेरी_तुम_!.._/_केदारनाथ_अग्रवाल)

हे मेरी तुम !
बिना तुम्हारे–
जलता तो है
दीपक मेरा
लेकिन ऎसे
जैसे आँसू
की यमुना पर
छोटा-सा
खद्योत
टिमकता,
क्षण में जलता
क्षण में बुझता ।

( खद्योत = एक छोटी सी नाव जिसपे एक दीपक रखकर नदी में बहाया जाता है, हरिद्वार में प्रचलित)

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12
Feb

आजकल ब्लॉग लिखे में स्वतंत्रता नही है। कुछ लोग टिपण्णी लिखते हैं मेरे पोस्ट पे। ये मुझे अच्छा लगता है, धन्यवाद! लेकिन उसके साथ ही साथ अब मुझे लगने लगा है की कुछ ऐसा लिखूं जिसपे कुछ न कुछ टिपृपणी ज़रूर आए। तो मूलभूत रूप से अब में अपने नही, अपितु दूसरों के लिए लिखने की कोशिश करता हुआ स्वयं को पाता हूँ। यह सही नही है।

यह अजीब बात है की मैंने ज्यादा लोगों को अपने ब्लॉग के बारे में नही बताया है, मेरे ख़याल से १-२ को छोड़ के सबने अपने आप ही इसे मेरी ऑरकुट profile या पता नही कहाँ से खोजा है, और ये बात भी मेरे को ठीक लगती है। क्यूंकि मैंने शुरुवात इसी ख्याल से की थी की कोई अपने आप पढ़े तो ठीक लेकिन मैं किसी को इसके बारे में नही बताऊँगा … ताकि मैं अपने लिए लिखूं। ” Arts for Arts Sake” ।

अगर मैं अपने को अभिव्यक्त करने की आज़ादी चाहता हूँ, तो लोगों के विचार सुनने की आकांशा रुपी मोहपाश से स्वयं को मुक्त करना पड़ेगा।

24
Jan

दीवार के सहारे बैठे हुए,जब

मैं कुछ कहते कहते रुक जाता हूँ,

पूछती है मुझसे,

“क्या सोच रहा है,

कहाँ खो गया है ?”

और आंखों में देखते हुए,मेरे

जवाब का इंतज़ार करती है

तब उन लम्हों में,

चुप हो जाता हूँ,

कुछ बहकता हूँ, मैं कुछ खो जाता हूँ।

और उसे कुछ समझ नही आता॥

चेहरे पे उसके उलझन देख,

” अरे ऐसे ही यार! कुछ नही”, मैं हँसता हूँ

वो मुस्कुराती है,

और मैं कुछ और चुप हो जाता हूँ…..

क्या करें और कहाँ जाएँ?

क्या रात को सवेरे में तब्दील होते हुए,
पूर्वोत्तर कि ओर तकते जाएँ?

क्या जेहन में छुपे हुए गम को,
मुस्कुराहटों के झूठ में डुबोते जाएँ?

दुपहर मिल कर भी उनसे,
शाम को अनजाने होते जाएँ?

रिश्ता अजीब है ये ‘स्वतंत्र’,
चाहे नाम हज़ार देते जाएँ…