बहुत सारे लोग पीछे छूट गए हैं,
बहुत सारे रिश्ते टूट गयें हैं,
बहुत सारी यादें,
भूली बिसरी हो गयी हैं,
यादें धुंधली हो गयीं हैं.
मोतिआबिंद आँखें,
स्वप्रतिबिम्ब झाँकें
हम आगे निकल आयें है.

ख्याल बदल गयें है,
सवाल बदल गए हैं,
ख़ास लोग अब इतने याद नहीं आते,
ख़ास अब उनमे, हम कुछ नहीं पाते,
अगर हों भी वो अलग,
तो समय किसके पास है जनाब?
अगर बोरीवली लोकल छूट गयी.
तो जानते हो,
होगा कितना समय खराब?
हम आगे निकल आयें है.

वो बातें अब हो गयी हैं पुरानी,
इतनी पुरानी,
की ‘एक समय की बात है’
ऐसे कह सके हम कहानी
लोगों के नाम अब याद नहीं,
उनके बारे में पता करने का,
अब उतना उन्माद नहीं.
पुरातन लगता नहीं आकर्षक
दिल करता नहीं उनके नाम पे धक् धक्
हम आगे निकल आये हैं.

पुरानी यादें हमेशा रहती अधूरी हैं,
अब बाकी बातें जानना ज्यादा जरूरी है,
मसलन बांद्रा और पार्ला में,
कितने स्टेशन की दूरी है?
और सुंदरी के मूर्ख विचारों पर,
बेसरपैर की बातचीत पे,
कब करनी जी हजूरी है?
क्यूंकि भूत गया है पीछे छूट,
और मैं हुआ हूँ स्मार्ट
पहने सूट बूट
दुनिया करता लूट.
हम आगे निकल आयें है.

Category: futility, past, poem  Tags: ,  
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