यह कविता कविता कोष / http://avinashkishoreshahi.wordpress.com/2010/03/30/ से ली गयी है.
मैं तमाम दिन का थका हुआ, तू तमाम शब का जगा हुआ
ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर, तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ
कई अजनबी तेरी राह के मेरे पास से यूँ गुज़र गये
जिन्हें देख कर ये तड़प हुई तेरा नाम लेके पुकार लूँ


Hi varun, I visited your blog. Nice posts. Good to know that you too are from PEC. I passed in 2003. Accha laga jaan ke kee tumhein hindi gazlein aur kavitayein pasnd hai.. Will surely go through all your posts in detail later…
Prashant
अरे सर! आप आये मेरे ब्लॉग पर येही बहुत बड़ी बात है मेरे लिए. मेरे ख़यालात और लफ्ज़ आपकी तरह पक्के तो नहीं, लेकिन तब भी कुछ कुछ लिखने की कोशिश करता रहता हूँ. आपकी नज़्म - “एक अरसा गुज़र गया” का मैं कद्रदान हूँ.