कौन मूरख़ है? क्या वो जो धीरे सोचता है , या वो जो धीमे काम करता है, या वो जो पढाई अथवा खेल-कूद में पिछड़ा है?क्या वो जो अजीब सवाल पूछता है या वो जो अजीब बातें करता है ,या फिर वो जिसका काटने में सबसे अधिक आनंद आता है?

कहना मुश्किल है ! लेकिन ज़रा सोच के देखिये, हम सब जीवन के किसी न किसी मोड़ पे, कुछ मूर्ख़ता नही करते है? एक सवाल उभरता है…. क्या हम सब, किसी न किसी की नज़रों में मूर्ख नही हैं?

हमे क्या अधिकार है की किसी का मजाक उडायें ? हमे क्या अधिकार है की किसी और की बुराई करें ? ख़ुद में कभी झांक कर तो देखे की आखर हम कौन बड़ी तोप है जो दूसरे को गधा कहे!

फुददु वो है जो अपने को दूध का धुला समझे और सोचे की उससे बेहतर व्यक्ति नज़र नही आता. नज़र उठा के देख आदम!! हर वो चीज़ जो मै करता हूँ, मुझसे १०० गुना बेहतर कोई और कर सकता है, और हर वो चीज़ जिसपे तुम इतराओ , उससे १०० गुना वोही किसी और के पास भी हो

“बना है शाह का मुसाहिब , फिरे है इतराता
वरना शहर में गालिब की आबरू क्या है “

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