This was written today after being overwhelmed by Anchaliya’s royal treatment at Houston. He went wayyy out of his way to make me feel comfortable and happy. I am in awe of his behaviour.
वापस आने के बाद ख्याल आया,
क्या दोस्ती हम भी उतनी ही निभा पाएंगे?
ये बात सही है की दोस्ती में कमी नहीं,
पर क्या दोस्ती का जूनून दिखा पाएंगे?
फफक उठे सीने से कशिश बन के चस्म -ए-नम,
सवाल है क्या मौके पे निशाँ आयेंगे ?
समझे, या न समझे, वो हमारा बयान,
हर वक़्त हमे वो अपने साथ खड़ा पाएंगे!
वरुण अग्रवाल, २७ अगस्त २०१०

