रात के १ बजे मैं फ़िल्म review लिख रहा हूँ, ये इस बात का प्रमाण है की मैं अभी तक देव डी के नशे से बहार नही आ पाया हूँ,. देखिये साहब सीधी सीधी बात है. या तो आपको ये फ़िल्म बेहद पसंद आयेगी, या आपको ये एक इमोशनल अत्याचार के सिवा और कुछ न लगेगा. मैं पहली श्रेणी में अपने को पाता हूँ. लोग कह सकते हैं की ये एक व्यभिचारी फ़िल्म है और उन्हें इसमे सस्ते व्यंग्य की बू आ सकती है, या मेरी नज़रिए से देखें तो अपने को बर्बाद करने का जूनून सर चढ़ कर बोलता है. पागलपन है एक जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है. मुझे क्या पसंद आया? पता नही , सच में पता नही. अगर मैं आपसे पूछूँ की भई बिरयानी में चावल अच्छा था, या नमक अच्छा था, या कर्री अच्छी थी, तो आप क्या कहेंगे? पता नही न? ठीक वैसे ही मुझे नही पता की साला इस फ़िल्म में ऐसा क्या था जो मुझे किसी हथौडे की तरह ‘hit’ कर गया. शायद चंडीगढ़ में रहने की वजह से और दिल्ली के दरियागंज की सड़क का दृश्य या फिर कैमरे के विभिन्न कोण, या फिर संगीत, या कोकीन के शॉट्स, या सिगरेट का dhuaN …उम्म्म पता नही. साला शाहरुख़ की देवदास देख में सोचता ही रह गया की B.C., किसी को इस फ़िल्म में ऐसा क्या लगा की ९ और बन गयीं इस उपन्यास के ऊपर. और देव डी को देख मैंने सोचा, अनुराग कश्यप, केवल तुम इस बर्बादी को समझ पाए हो. पागलपन है साहब, बस पागलपन.

Category: Dev D, movie review  
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8 Responses
  1. Anonymous says:

    Film vakai jabardast hai.

  2. प्रदीप मानोरिया says:

    सत्य वचन स्वामी जी

  3. mayur dubey says:

    beutiful layout and good review,aap 1 baje tak film main khoye the main to hafte bhar se logon ko is pagalpan ke baare main bata raha hoon koi samajhta hi nahi

    हमारा ब्लॉग एड्रेस हैhttp://sarparast.blogspot.com/

  4. Abhishek says:

    Swagat Blog Parivar mein.

  5. govind goyal says:

    prem hai hee aisa, narayan narayan

  6. सुंदर अभिव्यक्ति !अच्छा लगा पढ़कर …/

  7. yash says:

    क्या लिखा है…मान गए भैय्या यार्..

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