बचपन में एक कहानी पढी थी। किसी ऋषि को एक चुहिया मिली। उसने उस चुहिया को मानव रुप दिया और कहा,”आज से तुम मेरी बेटी हो”। समय बीता और वह रूपवती परिपक्व हो गयी। सवाल आया कि उससे शादी लायक लड़का कहाँ से ढूंढें? ऋषि को लगा सूर्य सबसे बलवान है, अतः वह सूर्य के पास गया और कहा कि हे सूर्य देव, आप मेरी पुत्री से विवाह कर लें!
सूर्य ने कहा, “आपकी आकांक्षा मेरे सर माथे, किन्तु बादल मुझसे शक्तिशाली है क्योंकि वह मेरी किरणों को रोक देता है, आप उसे विवाह योग्य वर माने” । ऋषि बादल के पास गए, किन्तु उसने कहा पर्वत सबसे शक्तिशाली है क्योंकि वह मेरा रास्ता रोक देता है… आप गिरिराज हिमालय के पास जाएँ। हिमालय ने कहा,” हे सिद्ध आत्मा, एक चूहा मेरे में बिल खोद कर मुझे खोखला कर देता है, मेरी सारी शक्ति धरी कि धरी रह जाती है। आप तो मूषक के पास जाएँ।”
चूहे ने कहा -” ऋषिदेव, मनुष्य प्रजाति से मेरे को डर लगता है, आप अगर रूपवती को चुहिया बना दें तो मैं उससे विवाह कर सकता हूँ” । ऋषि ने तधास्तु कह उसे फिर से चुहिया बना दिया और वे दोनो ख़ुशी ख़ुशी विवाहत्तर जीवन जीने लगे
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जाने क्यों सिरसा से आते वक़्त यह कहानी बार बार मेरे मन में आती रही। मैंने अपने जीवन की बारे में सोचा। मेरे CV को अगर कोई देखें, तो प्रभावित हुए बिना नही रह सकता। उसमे आपको मेरे व्यक्तित्व के कई बेजोड़ नमूने देखने को मिलेंगे। लगेगा कि वाह! क्या मेहनत से लड़के ने ये सभी पुरस्कार जीते हैं। जहाँ जहाँ CV डाला, वहाँ वहाँ वह shortlist भी हुआ। लेकिन अगर मैं सच में उन चीजों के बारे में सोचुँ तो मुझे ख़ुशी कम और दुःख ज्यादा होता है।
मेरी सफलता के पीछे लगता है कि कितने त्याग भी हैं। हर उपलब्धि मालुम पड़ता है जैसे जीभ चिढा रही हो । मानो ये कह रही हो कि “मुझे पाकर भी तुमने क्या हासिल कर लिया?”। ये सब CV के मुद्दे केवल कागज़ पे छिपे काली स्याही के बेढब अक्षरों से अधिक कुछ नही लगते …. और हर बार जब मैं उन्हें पढता हूँ तो मुझे अपने से उतनी ही अधिक घिन्न होती है। याद आता है कि कितना समय जो मैंने कैशोनोवा में बर्बाद किया, वो मित्रों और परिवार के पास जा सकता था। कितना समय जो मैंने PEC की बेवकूफियों में व्यर्थ किया वो मेरी माँ के पास जा सकता था। मेरे माता पिता अकेले रहते हैं अजमेर में और अपनी इस इनवेस्टमेंट बैंकिंग की नौकरी कि वजह से मैं उन्हें और अपने परिवार एवं मित्रो को पूरा समय नही दे पाऊँगा।
याद आता है कि मैंने जानबूझ कर कभी मन में किसी के प्रति सच्चे प्रेम की भावना नही आने दी…क्योंकि वह मुझे आगे बढ़ने से रोक देती। अपने को किसी भी सुन्दर चीज़ के लिए रुकने नही दिया क्योंकि मुझे सदैव प्रथम रहना था। वरुण अग्रवाल भला कभी पीछे कैसे रह सकता है?
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ये चूहे और मनुष्य की कहानी मैं भूल गया था। लेकिन सरसों के खेत, मिट्टी की खुशबू, बस में सफर , रेल की पटरी और शादी देखकर याद आया की मैं भी अधिकाधिक एक चूहा ही तो हूँ । मैं भी हमेशा अपने को और बेहतर बनने के लिए नए लक्ष्य ढूँढता रहता हूँ और आखर में मालूम पड़ता है कि एक सादा मनुष्य बनना ही अच्छा होता -

फलानुसार कर्म के, अवश्य बाह्य भेद हैं।

परन्तु अंतः एक है, प्रमाण भूत वेद हैं॥

Category: ambition, futility  
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7 Responses
  1. आलोक says:

    भय्यू,
    सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ लेने के बाद सफलता को तिरस्कार की दृष्टि से देख पाना सरल ही है, है न?

    आलोक

  2. Bhaiyyu says:

    aapki baat theek hai. Lekin safalta paane ke baad hi uski shanbhangurta ka ehsaas hota hai -
    varun

  3. उन्मुक्त says:

    ‘आखिर में मालूम पड़ता है कि एक सादा मनुष्य बनना ही अच्छा होता’
    यही जीवन का निचोड़ है पर है सबसे मुश्किल।

  4. Anonymous says:

    Can’t help but comment about what you have just written…
    I can say that I know what you feel…
    Trust me buddy…. whenever you sit alone and think about the things that you are proud of… CV is the last thing that wil come to your mind…
    But now that you have realized it… why not make amends..
    All that you have to do is to send this post to the “right” people..

    All the best.. Hope this realization goes beyond words..

  5. yash says:

    pata nahi kitne log aisaa sochte hai…

  6. yash says:

    पता नहि कित्ने लोग आप्कि इस्स बात से इत्त्फाक रख्ते है..लेकिन म शायद इस खयाल से रुबरु हो चुका हो

  7. seema gupta says:

    nice story with good moral

    regards

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