Oh me!

We are so small between the stars & so large against the sky. and lost in subway croud, I try to catch your eye …..

स्मृति

February7

भागता गया मैं
रात और दिन
उत्तर दक्षिण , पूरब पश्चिम

हिंदुस्तान से अमरीका
अमरीका से कंबोडिया
कैम्ब्रिज से नेटिक
और फिर नेटिक से कैम्ब्रिज
रटगर्स से हार्वर्ड
रेड लाइन से ग्रीन लाइन
एटलांटिक से प्रशांत
दिन प्रतिदिन
मौसम से मौसम
साल प्रति साल

मैंने मदद मांगी
फूलों से और पेड़ों से
नदियों से, पहाड़ियों से
मेपल से ओक से
कल्पतरु से
सूरज की किरणों से
ब्रह्माण्ड क नक्षत्रों से

कोई न बचा पाया
कोई न छुपा पाया
तुम्हारी स्मृति से

तुम्हारी यादें
काल और समय की
सीमाओं को नहीं पहचानती
वे स्वयं
ईश्वर से हार नहीं मानतीं

 

( Cambridge, 7 Feb 2016 )

posted under Emotion, love, marriage, poem
One Comment to

“स्मृति”

  1. On March 29th, 2016 at 5:05 am Shweta Goel Says:

    I accidentally stumbled over your blog. Really liked your style of writing!

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