Oh me!

We are so small between the stars & so large against the sky. and lost in subway croud, I try to catch your eye …..

घर छोड़ना

August22

“निकलना खुल्द से आदम का सुना था हमने,
पर बड़े बे-आबरू हो तेरे कूचे से हम निकले (ग़ालिब )”

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ज़्यादा समय नहीं लगता
अपना बोरिआ बिस्तर बाँधने में

कुल जमा एक अलमारी का सामान है
और दो सूटकेस काफी हैं
अपनी किताबों, कपड़ों, डाक टिकट
डायरी और जूते रखने के लिए

आधे घंटे सामान रखो
और ज़िन्दगी भर सोचते रहो
क्या छोड़ आया, क्या ले आया

ढाई बजे की धुप मखमली है
चार्ल्स नदी सतत बहती है.

 

( Boston, 8/22/2014 )

posted under marriage, poem, present

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