Oh me!

We are so small between the stars & so large against the sky. and lost in subway croud, I try to catch your eye …..

उदासी के रंग – कुंवर नारायण

October25

यह कविता यहा से ली गयी है. ( क़विता कोश)
यह कविता, जो बहुत कम शब्दों में बहुत अधिक कह जाती है, हमे बताती है की कुंवर नारायण को साहित्य अकादमी का सम्मान क्यूँ मिला! बेहद खूबसूरत, कमाल है!

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उदासी भी
एक पक्का रंग है जीवन का

उदासी के भी तमाम रंग होते हैं

जैसे

फ़क्कड़ जोगिया

पतझरी भूरा

फीका मटमैला

आसमानी नीला

वीरान हरा

बर्फ़ीला सफ़ेद

बुझता लाल

बीमार पीला

कभी-कभी धोखा होता

उल्लास के इंद्रधनुषी रंगों से खेलते वक्त

कि कहीं वे

किन्हीं उदासियों से ही

छीने हुए रंग तो नहीं हैं ?

posted under futility, Nature, poem
5 Comments to

“उदासी के रंग – कुंवर नारायण”

  1. On October 25th, 2010 at 1:00 pm madhav Says:

    सुन्दर

  2. On October 25th, 2010 at 1:48 pm amrendra nath tripathi Says:

    प्रिय भाई ,
    एक अजीब सा इश्क है कुंवर जी की लेखनी से !
    हर कविता इतनी मुलायम और एहसास से भरी होती हैं कि पढ़ते ही हृदयस्थ हो जाती हैं ! एक ‘उदासी’ को लेकर ऐसी बुनावट की गयी है कि ‘जश्न’ की हकीकत से भी रूबरू हुआ जा सकता है ! आभार !

  3. On October 25th, 2010 at 7:18 pm anupama Says:

    सुन्दर!
    उल्लास में भी उदासी के रंग मिश्रित !
    सच्चे और कोमल विम्ब!!!

  4. On October 26th, 2010 at 12:11 pm Rakesh Pathak Says:

    उदासी के भिन्न भिन्न रंग को सिर्फ पढ़ना ही नहीं महसूस करना भी हुआ इन पंक्तियों में …. भूरे, मटमैले,नीले पीले जाने कितने रंग, उदासी के इन्द्रधनुष में गुथना अद्भुत है …………. नयी कविता के बड़े हस्ताक्षर में से एक कुंवर नारायण जी को पढ़ना भी अपने आप में बड़ी बात है..

  5. On October 26th, 2010 at 1:14 pm madhav Says:

    सुन्दर्

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