Oh me!

We are so small between the stars & so large against the sky. and lost in subway croud, I try to catch your eye …..

अब जबकि तुम इस शहर में नहीं हो ( शरद बिलौरे )

April26

(कवि मात्र 25 साल के थे जब 1982 में लू लगने से उनका निधन हो गया. )

इस कविता को समझने के लिए प्रेम में होना (या किसी समय रहा होना ) आवश्यक है. साधू!

कविताकोश के साभार ली गयी है ये रचना.

===

हफ़्ते भर से चल रहे हैं
जेब में सात रुपये
और शरीर पर
एक जोड़ कपड़े

एक पूरा चार सौ पृष्ठों का उपन्यास
कल ही पूरा पढ़ा,
और कल ही
अफ़सर ने
मेरे काम की तारीफ़ की।

दोस्तों को मैंने उनकी चिट्ठियों के
लम्बे-लम्बे उत्तर लिखे
और माँ को लिखा
कि मुझे उसकी ख़ूब-ख़ूब याद आती है।

सम्वादों के
अपमान की हद पार करने पर भी
मुझे मारपीट जितना
गुस्सा नहीं आया

और बरसात में
सड़क पार करती लड़कियों को
घूरते हुए मैं झिझका नहीं

तुम्हें मेरी दाढ़ी अच्छी लगती है
और अब जबकि तुम
इस शहर में नहीं हो
मैं
दाढ़ी कटवाने के बारे में सोच रहा हूँ।

posted under Emotion, love, poem, sweetness
2 Comments to

“अब जबकि तुम इस शहर में नहीं हो ( शरद बिलौरे )”

  1. On April 29th, 2012 at 9:08 pm देवेन्द्र पाण्डेय Says:

    बहुत अच्छी कविता है। अपने बेरोजगारी के दिन याद आ गये। आपकी पसंद की प्रशंसा करनी पड़ेगी।

  2. On April 29th, 2012 at 9:11 pm bhaiyyu Says:

    धन्यवाद देवेन्द्र जी! हाँ, कद्रदानो का भी थोडा बहुत महत्त्व है कला के संसार में!

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